सरकारी अधिवक्ता रत्नेन्दु सिंह ने तर्क दिया कि याची ने जिन लोगों को शस्त्र लाइसेंस जारी किया है, वे उसके रिश्तेदार हैं और दूसरे जिले के निवासी हैं। इसलिए याची की भूमिका स्पष्ट है और उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को निरस्त नहीं किया जा सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्तार अंसारी के शस्त्र लाइसेंस आवंटन का मामला मऊ सीजीएम कोर्ट भेज दिया है। कोर्ट ने कहा है कि याची इस मामले में एक महीने में सीजीएम कोर्ट के समक्ष आवेदन करेगा और सीजीएम कोर्ट उस पर दो महीने में मामले में विधि सम्मत सुनवाई कर अपना निर्णय देगी। यह आदेश न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी ने याची मुख्तार अंसारी की ओर से दाखिल याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है।
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इसके पहले अधिवक्ता उपेंद्र उपाध्याय ने कोर्ट समक्ष तर्क दिया कि याची मुख्तार अंसारी 2001 में मऊ सदर सीट से विधायक था। उसने चार लोगों को शस्त्र लाइसेंस निर्गत करने के लिए सिफारिश की थी। सियासी रंजिशवश उसके खिलाफ 2020 में मुकदमा दर्ज किया गया। तर्क दिया कि शस्त्र लाइसेंस जारी करने का काम पुलिस और प्रशासन का है। विधायक की ओर से अगर गैर विधिक तौर पर लाइसेंस जारी करने की सिफारिश की गई है तो तत्कालीन डीएम को देखना चाहिए। इसमें याची की ओर से कोई गलती नहीं की गई है और न ही इसमें कोई षडयंत्र किया गया। जबकि सरकारी अधिवक्ता ने इसका विरोध किया।
सरकारी अधिवक्ता रत्नेन्दु सिंह ने तर्क दिया कि याची ने जिन लोगों को शस्त्र लाइसेंस जारी किया है, वे उसके रिश्तेदार हैं और दूसरे जिले के निवासी हैं। इसलिए याची की भूमिका स्पष्ट है और उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को निरस्त नहीं किया जा सकता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि उपयुक्त उपाय यही है कि मामले की सुनवाई पूरी कर आदेश पारित कर दिया जाए। उन्होंने याची से कहा कि वह एक महीने के भीतर सीजीएम कोर्ट के समक्ष केस की सुनवाई पूरी करने से संबंधित एक आवेदन पत्र प्रस्तुत करेेगा।
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सीजीएम कोर्ट उस पर दो महीने में विधि सम्मत आदेश पारित करेगी। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याची को पहले से ही सत्र न्यायालय से जमानत मिली हुई है। लिहाजा, उसे किसी उपचार की जरूरत नहीं है। अच्छा यही है कि केस की सुनवाई पूरी कर मामले का निस्तारित किया जाए। मामले में विधायक के खिलाफ 2020 में दखिन टोला में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।