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इलाहाबाद हाईकोर्ट : तथ्यात्मक साक्ष्य पर विचार नहीं, ट्रायल कोर्ट ही देखेगी

Sat, 15 Jul 2023 03:54 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

कोर्ट ने छात्रा से छेड़छाड़ व मारपीट कर घायल करने के मामले में सिविल व आपराधिक दोनों केस चलने के कारण आपराधिक केस रद्द करने की मांग अस्वीकार कर दिया है। साथ ही याची को अदालत में समर्पण कर जमानत अर्जी दाखिल करने पर नियमानुसार तय करने का निर्देश दिया है।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल अपवाद स्वरूप किया जाना चाहिए। इस याचिका में विवादित तथ्यात्मक साक्ष्यों पर विचार नहीं किया जा सकता। यह ट्रायल कोर्ट में देखा जाएगा।

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कोर्ट ने छात्रा से छेड़छाड़ व मारपीट कर घायल करने के मामले में सिविल व आपराधिक दोनों केस चलने के कारण आपराधिक केस रद्द करने की मांग अस्वीकार कर दिया है। साथ ही याची को अदालत में समर्पण कर जमानत अर्जी दाखिल करने पर नियमानुसार तय करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित अपराधों में सात साल से अधिक सजा की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइंस के तहत निर्णय लिया जाय। यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश पाठक ने मुकेश यादव व चार अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है।

याची के खिलाफ थाना केराकत, जौनपुर में एफ आई आर दर्ज कराई गई। सिविल वाद भी कायम किया गया है। आपराधिक केस में चार्जशीट पर संज्ञान लिया है। दोनों ही कार्यवाही में अदालत ने सम्मन जारी किया है। याचिका में चार्जशीट, सम्मन आदेश सहित केस कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कोर्ट कार्यवाही से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया गया है। इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। याची का कहना था सिविल विवाद के कारण उसे झूठा फंसाया गया है। छेड़-छाड़ मारपीट की कोई घटना ही नहीं हुई है।

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