इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि महज कंपनी का निदेशक होने के नाते किसी पर निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई अधिनियम) की धारा 138 के तहत मुकदमा नहीं चलाया सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति सैयद आफताब हुसैन रिजवी ने जतिंदर पाल सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
याची ने हाईकोर्ट में गौतमबुद्धनगर जिला अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी। मामले में प्रतिवादी की ओर से याची केखिलाफ चेक भुगतान के संबंध में चार जुलाई 2012 को शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि बैटरी बैंक चार्जर की खरीद में जारी किए गए दो चेक का भुगतान नहीं हुआ।
याची कंपनी का निदेशक है। प्रतिवादी ने अपनी शिकायत में कंपनी के साथ निदेशक सहित अन्य (याची) को आरोपी बनाया था। याची की कंपनी और प्रतिवादी के बीच कुल साढ़े चार करोड़ रुपये से अधिक का बैटरी बैंक चार्जर की आपूर्ति के साथ सौदा हुआ था। कंपनी की ओर से दो चेकों के जरिए भुगतान किया गया था।
प्रतिवादी ने दोनों बाउंस चेकों के तहत बकाया राशि के भुगतान की मांग करते हुए कंपनी को कानूनी नोटिस जारी किया। याची निर्धारित समय के भीतर भुगतान नहीं सका। जिस पर मामले में निचली अदालत ने सुनवाई करते हुए एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत समन जारी किया। याची ने इस समन के खिलाफ अपील दायर की, लेकिन निचली कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। इस पर याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने एसएमएस फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड बनाम नेता भल्ला व अन्य-2005 केस का हवाला देते हुए कहा कि निदेशक होने के नाते आपराधिक दायित्व नहीं डाला जा सकता है। तथ्य यह भी है कि याची ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया है। कोर्ट ने कहा कि मामले में मजिस्ट्रेट ने ठीक से विचार नहीं किया। याची को तलब करने का आदेश अन्यायपूर्ण और अवैध है। इसे बनाए नहीं रखा जा सकता है। लिहाजा, समन आदेश का रद्द किया जाता है।