सेक्टर तीन में ही काली मार्ग पर अघोरेश्वर भगवान राम के शिविर में सत्संग के साथ निरोगी जीवन का संदेश मिल रहा है। वहीं मुंबई से आए बाबा अशीष राम सेक्टर तीन में गाटा संख्या चार पर लगे शिविर में साधनारत हैं। अघोरेश्वर आशीष की धुनि जलाने के लिए हर रोज श्मशान की लकड़ी लाई जाती है। इस शिविर में श्मशान की चिता की बुझी हुई लकड़ी का ही धूना जल रहा है। बाबा अशीष अघोरी शब्द की व्याख्या उजाले के रूप में करते हैं।
जीवन के अंधकार को दूर कर देता है अघोर पंथ
उनका कहना है कि अघोर पंथ वह है जो जीवन में व्याप्त घोर अंधकार हो हमेशा के लिए दूर कर दे। लेकिन, इस दौर में अघोरियों के रहन-सहन और तौर-तरीके को पाखंड के रूप में देखा जाता है। कुछ वेशधारियों की वजह से शैव संप्रदाय की इस परंपरा को क्षति पहुंचाई जा रही है। अघोरपंथी बाबा आशीष बताते हैं कि अघोर भगवान शिव के पांच रूपों में से एक है। इसीलिए ये अघोरी शव पर बैठकर साधना करते हैं। शव से शिव की प्राप्ति का यह रास्ता अघोर पंथ की परंपरा का हिस्सा है। ये अघोरी तीन तरह की साधना करते हैं। शव साधना,शिव साधना और श्मशान साधना।
अघोर का अर्थ है सरल। यानी जो घोर या जटिल न हो। तरह-तरह का वेश बनाकर खप्पर-खोपड़ी लेकर लोगों को डराने या परेशान करने वाले पाखंडी हैं। - अघोरी नहीं। बाबा आशीष राम।