पंचक की समाप्ति के बाद भोले के भक्त कांवड़िए एक बार फिर पूरे जोश में दिखे। केसरिया रंग में रंगने के साथ ही बोल बम के जयकारे के साथ कांवड़ लेकर चलने के लिए उनमें गजब का उत्साह रहा। दारागंज में गंगाभवन (अब निर्वाणी अणी) से लेकर भारतीय स्टेट बैंक तक सजी कांवर की दुकानों और जल भरने आते, जल भरकर जाते कांवड़ियों की मौजूदगी से पूरा क्षेत्रा केसरिया चादर ओढ़े है। इलाहाबाद और दूरदराज से आए कांवड़ियों के जत्थों का दशाश्वमेध घाट पर जल भरने के लिए आने का क्रम पूरे दिन जारी रहा। इस घाट की पौराणिक मान्यता है, इसीलिए ज्यादातर कांवड़िये जल भरने को यहीं जुटते रहे। ज्यादातर कांवड़िए समूहों में ही दिखे। इलाहाबाद के शहरी और ग्रामीण अंचल के अतिरिक्त सुल्तानपुर, रीवा, भदोही, औराई प्रतापगढ़ आदि जिलों से आने वाले कावंड़ियों की संख्या सबसे ज्यादा रही। यहां से जल भरकर कावंड़िए बाबा धाम, बाबा विश्वनाथ, पड़िला महादेव, लालापुर शिवधाम आदि मंदिरों के लिए रवाना हुए।
वहीं सप्ताह भर बाद भी घाटों पर गंदगी और अव्यवस्था का ही बोलबाला दिखा। यह श्रद्धा ही रही कि बोल बम के जयकारों के बीच कांवड़ियों ने गंगा स्नान के बाद गंगा जल भरा और घाट किनारे आकर गंगा पुत्र घाटियों के यहां कांवड़ की पूजा कराई। फिर बोलबम के जयकारों के साथ शिवधाम के लिए रवाना हो गए। औराई से आए रमेश पांडेय और फूलपुर से आए जंगम गुप्ता ने कहा, घाटों किनारे की गंदगी विचलित करती है लेकिन मन में संकल्प है सो जल भरकर शिवधाम के लिए रवाना हो रहे हैं।
महिला कांवड़ियों में भी अद्भुत उत्साह दिखा। कांधे पर कांवड़ लेकर गोरखपुर से आई रामरती की टोली में लगभग डेढ़ दर्जन महिलाएं शामिल थीं। पूछने पर रामरती, कौशल्या, जानकी, पद्मावती आदि ने कहा, वर्षों से परिवार में यह परंपरा जारी है, हम भी उसी का पालन करते हुए पुल तक आत हैं। यहां भरा गया जल, शिव मंदिरों में जाकर चढ़ाएंगे और भोले से अपने बेटे और पति की लंबी आयु के लिए आशीष मांगेंगे।
घाट से पहले दुर्गा मंदिर के पास तो साफ-सफाई दिखी लेकिन सड़क पर बहते सीवर के पानी ने मन खिन्न किया। कांवड़ियों की संख्या के मुताबिक शौचालयों की संख्या अब भी कम ही दिखी। ऐसे में राम जानकी मंदिर, औरंगाबाद के सामने खुले में शौच भी दिखा। संगम तट की ओर से आने वाले संकट मोचन मंदिर के पास गंदे जल की समस्या से जूझते रहे।
दारागंज में दशाश्वमेध घाट के पास स्थित प्राचीन दशाश्वमेध मंदिर पौराणिक भी है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार यहां ब्रह्माजी ने अश्वमेध यज्ञ किए थे। मंदिर में दशाश्वमेधेश्वर महादेव शिवलिंग, विशाल त्रिशूल, नंदी, शेषनाग की प्रतिमाएं हैं। पास में ही चैतन्य महाप्रभु का चरणचिह्न स्मारक और हनुमान एवं अन्नपूर्णाजी के मंदिर भी हैं लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह कि मंदिर के पास भी गंदगी और अव्यवस्था है।
पुजारी शिवशंकर का कहना है कि मंदिर के इर्द-गिर्द साफ-सफाई के साथ ही इसका सौंदर्यीकरण भी कराया जाना चाहिए ताकि कुंभ पर्व में यहां आने वाले तीर्थयात्री अच्छी छवि लेकर जाएं। प्रयागराज सेवा समिति के संयोजक तीर्थराज पांडेय ‘बच्चा भइया’ ने कहा, प्रशासन की ओर से पौराणिक दशाश्वमेध मंदिर की उपेक्षा उचित नहीं है। इसे विकसित करने के साथ ही मंदिर का महत्व भी रेखांकित किया जाना चाहिए।