इसके खिलाफ दोषियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पति को छोड़ सभी आरोपियों को जमानत मिल गई थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि विवेचना के दौरान संकलित साक्ष्य मेंं जले हुए कपड़े शामिल नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि मृत्यु पूर्व कथन संदिग्ध है। इसे विश्वसनीय दस्तावेज नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने सजा के बिंदु पर कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता कमल को आईपीसी की धारा 498ए और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 34 के तहत अपराध का दोषी नहीं माना है। वह मृतका के पति के परिवार का सदस्य नहीं है। दूसरे गांव का निवासी है। इसलिए कमल के खिलाफ मकसद साबित नहीं होता है। लिहजा, वह बरी किया जाता है। वहीं, मृत्युकालिक कथन के संदेहास्पद होने और साक्ष्यों की अविश्वसनीयता के आधार पर पति राजू समेत अन्य सभी आरोपियाें को बेगुनाह करार देते हुए आरोपों से बरी कर दिया।