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High Court :  मृत्युकालिक कथन में घटनाओं का सटीक वर्णन संदेहास्पद, पति समेत पांच की सजा रद्द

Sun, 29 Sep 2024 03:08 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

यह फैसला न्यायमूर्ति अरविंद सिंह सांगवान, न्यायमूर्ति मोहम्मद अजहर हुसैन इदरीसी की खंडपीठ ने पति राजू, ननद बबली, ससुर जयप्रकाश, सास विमला व पति के दोस्त कमल की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। मामला बुलंदशहर के पहसू थाना क्षेत्र का है।
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अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या में मृत्युकालिक बयान के आधार पर पति समेत पांच लोगों की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा कि 45 पंक्तियों के मृत्युकालिक कथन में घटनाओं का वर्णन इतना सटीक किया है कि सामान्य मानसिक स्थिति में भी एक गवाह से इतनी पूर्वधारणा संग गवाही देने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। अधिकारी को बयान दर्ज करने में करीब एक घंटा लगा था। क्योंकि, मृतक 90 प्रतिशत जल चुकी थी।

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यह फैसला न्यायमूर्ति अरविंद सिंह सांगवान, न्यायमूर्ति मोहम्मद अजहर हुसैन इदरीसी की खंडपीठ ने पति राजू, ननद बबली, ससुर जयप्रकाश, सास विमला व पति के दोस्त कमल की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। मामला बुलंदशहर के पहसू थाना क्षेत्र का है। दो जुलाई 2014 को चाचा मुनेश ने एफआईआर दर्ज कराई थी। मुनेश के मुताबिक उनकी भतीजी नीलम की शादी फरवरी 2010 मेें अनौना गांव के राजू के साथ हुई थी।

आरोप लगाया कि पति राजू, ननद बबली, ससुर जयप्रकाश, सास विमला व पति के दोस्त कमल उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करते थे और केरोसिन डाल कर उसे जला दिया। वहीं, दिल्ली के अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने विवेचना के बाद सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। बुलंदशहर की जिला अदालत ने सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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इसके खिलाफ दोषियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। पति को छोड़ सभी आरोपियों को जमानत मिल गई थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि विवेचना के दौरान संकलित साक्ष्य मेंं जले हुए कपड़े शामिल नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि मृत्यु पूर्व कथन संदिग्ध है। इसे विश्वसनीय दस्तावेज नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने सजा के बिंदु पर कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता कमल को आईपीसी की धारा 498ए और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 34 के तहत अपराध का दोषी नहीं माना है। वह मृतका के पति के परिवार का सदस्य नहीं है। दूसरे गांव का निवासी है। इसलिए कमल के खिलाफ मकसद साबित नहीं होता है। लिहजा, वह बरी किया जाता है। वहीं, मृत्युकालिक कथन के संदेहास्पद होने और साक्ष्यों की अविश्वसनीयता के आधार पर पति राजू समेत अन्य सभी आरोपियाें को बेगुनाह करार देते हुए आरोपों से बरी कर दिया।
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