संगम की रेती पर एक बार फिर आस्था ने डेरा डाल दिया है। शनिवार से शुरू हो रहे कल्पवास के लिए लाखों श्रद्धालु संगम तट पर पहुंच चुके हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों से आए कल्पवासी व्रत-तप, साधना और संयम का संकल्प लेकर तंबुओं की नगरी में बस गए हैं। पूरे क्षेत्र में जप, तप और पूजा-अनुष्ठान की तैयारी हो रही है।
शुक्रवार देर शाम तक श्रद्धालुओं का आगमन जारी रहा। कल्पवासियों ने अपने-अपने शिविरों में पहुंचकर आवश्यक सामान व्यवस्थित किया। संग लाए तुलसी के पौधों को कुटिया के बाहर रोपा गया, जबकि ठाकुर जी, पूजा सामग्री, दान की वस्तुएं, राशन और वस्त्र शिविरों के भीतर रखे गए। ई-रिक्शा, कार, पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से पुआल, बिस्तर, राशन और जलावन लकड़ी लाते कल्पवासी पूरे दिन नजर आए।
सहसों नीबी गारापुर निवासी 71 वर्षीय श्याम मुरारी तिवारी अपने परिवार के साथ ओल्ड जीटी रोड स्थित डूंग जी भूरा मठ के शिविर में कल्पवास करने पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि वे कई वर्षों से पूरे परिवार के साथ कल्पवास कर रहे हैं। प्रतापगढ़ जिले के सराय नहर राय निवासी कमल किशोर पांडेय भी अपनी पत्नी के साथ शिविर में पहुंच गए हैं। उन्होंने संगम स्नान के बाद कल्पवास के शुभारंभ की बात कही।
कौशाम्बी निवासी 80 वर्षीय राजकुमारी देवी अपनी 12 वर्षीय नातिन अदिती मिश्र के साथ कल्पवास करने आई हैं। अदिती ने बताया कि स्कूल बंद होने के कारण वह दादी की सेवा के लिए साथ आई है। वहीं, 22 वर्षों से कल्पवास कर रहे राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने इसे जीवन का अभिन्न हिस्सा बताया। भदोही जिले के भवानीपुर निवासी रामयज्ञ शुक्ल ने बताया कि नियम के अनुसार कल्पवास के आरंभ पर संकल्प लिया जाएगा।
तुलसी पूजन का विशेष विधान
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार कल्पवास के दौरान तुलसी पूजन का विशेष महत्व है। इसी कारण प्रत्येक कुटिया के बाहर तुलसी, केले और जौ के पौधे लगाए जा रहे हैं। मान्यता है कि जौ की वृद्धि के साथ ही सर्व मंगल और प्रगति होती है। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु संगम की रेती पर व्रत, तप और पूजा-अनुष्ठान के साथ कठोर नियमों का पालन करेंगे। कल्पवासी दिन में दो बार स्नान और एक समय भोजन करेंगे। एक माह तक संयमित जीवन, साधना और सेवा ही उनका मुख्य संकल्प रहेगा।