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ललही छठ बेटे के आयुद्यय एवं मंगलकामना को

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बेटे के आयुष्य, मंगलकामना को रखा व्रत
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0 भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम और छठ मइया की पूजा-अर्चना
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
बेटे के आयुष्य तथा मंगलकामना के लिए माताओं ने रविवार को ललही (हलषष्ठी) छठ का व्रत रखा। परंपरानुसार भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम और छठ मइया की पूजा-अर्चना की। घर के आंगन में अकेले या फिर सामूहिक रूप से जुटी माताओं ने किसी पात्र को ताल जैसा रूप दिया या मिट्टी से ही ताल बनाकर उसमें मूज लगाई और पानी भरा।
मिट्टी की कुलियों में बारह प्रकार के भुने हुए अन्न और मेवे रखे गए तो महुआ के पत्ते पर महुआ, दूब, फसही का चावल, हल्दी, दही रखकर पूजा करने के बाद आरती उतारी गई। अपनी-अपनी परंपरानुसार कहीं पुरोहित तो कहीं घर की बड़ी-बूढ़ी महिला ने ही छठ देवी की कथा सुनाते हुए उनकी महिमा बखानी। पूजा पूरी हुई तो व्रत रखने वाली महिलाओं ने घर की बड़ी-बूढ़ी महिलाओं और बुजुर्गों के पांव छूकर उनसे आशीष लिया। फिर चीनी के कुल्हड़ में रखे पंचमेवे और महुआ के पत्ते पर रखकर दही-फसही का चावल का प्रसाद लिया। एक ही समय फलाहार के नियम का पालन किया गया। चंद्रोदय पर अर्ध्य देने के बाद भी पूजा की गई। ज्यादातर महिलाओं ने गंगा-यमुना के विभिन्न घाटों या संगम में स्नान किया, नए कपड़े पहने और शृंगार भी किया।
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बिकती रही मूज, मिट्टी की कुलिया
पूजा के लिए आज मूज और महुआ सहित मिट्टी की कुलिया की भी जरूरत थी, सो महिलाएं या छोटे-छोटे बच्चे भी सिर पर टोकरियों में कुलिया, मूज, महुआ आदि पूजा सामग्री रखकर गली, मुहल्ले घूम-घूम कर बेचते रहे।

जोते-बोये खेत का अन्न नहीं
मान्यता के अनुसार व्रती महिलाओं ने पर्व पर जोते-बोये खेत का अन्न न ग्रहण करके फलाहार ही किया। पानी में पैदा होने वाला फसही काचावल, मिर्चा, नीबू या अन्य फलाहार आदि का ही इस्तेमाल किया गया।
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अनाज भुनाने को लगी भीड़
परंपरानुसार प्रसाद में भूने हुए अनाज का उपयोग किया गया। अत: अनाज को भुनाने के लिए मुहल्ले-मुहल्ले घूम रहे भड़भूजों के पास भीड़ जुटी। अनाज में जौ, गेहूं, चना, अरहर, धान, मटर, ज्वार, बाजरा आदि शामिल रहा।
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