श्राद्ध तर्पण को गंगा तटों पर जमावड़ा
0 तीर्थपुरोहितों की देखरेख में क्षौरकर्म सहित पिंडदान
इलाहाबाद। अश्विन मास कृष्णपक्ष में पितरों के श्राद्ध तर्पण को संगम समेत गंगा के विभिन्न तटों पर श्रद्धालुओं का जमावड़ा है। तीर्थपुरोहितों की देखरेख में यजमानों द्वारा कर्मकांड पूरे किए जा रहे हैं। शुक्रवार को जिनकी तिथि द्वितीया/तृतीया थी का श्राद्ध-तर्पण किया गया। गया जाने वाले श्रद्धालुओं का प्रयाग आकर तर्पण पूजन करने का क्रम भी जारी है।
ब्रह्ममुहूर्त से संगम सहित गंगा के विभिन्न तटों पर भी पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध को बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। अनूप त्रिपाठी निशान पीली कोठी की देखरेख में मुंबई से आए विवेक पोद्दार ने पिंडदान, तर्पण एवं श्राद्ध किया। राजकुमार शर्मा निशान थाली वाले के निर्देशन में छत्तीसगढ़ से आए यजमानों ने क्षौरकर्म करा गंगा स्नान किया गया। परंपरागत रीति से पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और श्राद्धकर्म पूरा किया गया। सामर्थ्य एवं श्रद्धा अनुसार गोदान, वस्त्र अन्न दान भी किया। अंबर पांडेय निशान टेढ़ी नीम वाले की देखरेख में नरसिंहपुर के रामकुमार पटेल 40 लोगों के साथ संगम तट आए और पिंडदान तर्पण कर काशी के लिए रवाना हो गए।
गया के बाद तर्पण नहीं
विपुल पंडा निशान हाथी वाले बताते हैं कि जिनके परिजन गया में पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण व श्राद्ध कर देते हैं, उन्हें बाद में तर्पण की जरूरत नहीं। मान्यता है कि गया में तर्पण के बाद पितरों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। गया के बाद उनके निमित्त श्राद्ध तर्पण नहीं होता। परिजन यदि चाहें तो पितृपक्ष के दौरान सिर्फ ब्राह्मण को भोजन कराके दान दक्षिणा दे सकते हैं। प्रयाग को भगवान विष्णु का मुख, काशी को नाभि और गया को उनका चरण माना गया हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि प्रयाग में श्राद्ध किए बिना पिंडदान पूरा नहीं होता है। इसलिए गया जाने वाले श्रद्धालु पहले प्रयाग में श्राद्ध तर्पण करते हैं।