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Aligarh News: ऐसी क्या मजबूरी..जन्म के पहले घंटे में बच्चे की मां के दूध से दूरी

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प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : Archive
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जागरूकता बढ़ने के बावजूद नवजातों को समय पर स्तनपान कराने की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है। महिला अस्पताल के अनुसार प्रसव के बाद दस में से आठ माताएं अपने शिशु को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान नहीं करातीं।
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यह स्थिति केवल कामकाजी महिलाओं तक सीमित नहीं, बल्कि गृहिणियों में भी देखने को मिल रही है। इसे देखते हुए शनिवार को विश्व स्तनपान सप्ताह के तहत जागरूकता अभियान शुरू किया जाएगा।

स्वास्थ्य विभाग लगातार गर्भवती महिलाओं और परिजनों की काउंसिलिंग कर रहा है, फिर भी शुरुआती छह माह तक केवल मां का दूध पिलाने को लेकर जागरूकता का अभाव बना हुआ है। चिकित्सकों के अनुसार जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करने से नवजात की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, संक्रमण का खतरा कम होता है और मां-बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। शिशु के संपूर्ण शारीरिक और मानसिक विकास के लिए छह माह तक केवल मां का दूध सबसे उपयुक्त आहार माना जाता है।
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महिला अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि कई बार प्रसव के समय तनाव, पारिवारिक परिस्थितियां और परंपरागत भ्रांतियां भी स्तनपान में बाधा बनती हैं। कुछ मामलों में परिवार की महिलाएं भी पुराने रीति-रिवाजों के कारण नवजात को तुरंत मां का दूध नहीं पिलाने देतीं।

बाल रोग विशेषज्ञ एवं आईपीए अध्यक्ष डॉ. प्रदीप बंसल ने कहा कि जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करना नवजात के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। इससे बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और उसके स्वस्थ विकास की मजबूत नींव पड़ती है।


हमारे यहां स्तनपान के लिए विशेष जागरूकता अभियान जारी है। एमएनसीयू में मां को साथ इसीलिए रखा जाता है। एलपीयू में मां का दूध निकालकर उसे स्टोर करने तक की सुविधा है। इसके बाद एक साल तक काउंसिलिंग जारी रहती है। अब शनिवार से एक सप्ताह तक विशेष कार्यक्रम भी चलाए जाएंगे।
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-डॉक्टर तैयब, सीएमएस महिला जिला अस्पताल
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