फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

AMU: अलीगढ़ में भेड़िया-लोमड़ी हुए विलुप्त, सियार और खरगोश भी हो रहे कम

Sat, 13 Dec 2025 01:27 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

अलीगढ़ गजेटियर में जिक्र है कि भेड़िया, लोमड़ी, सियार, जंगली सूअर भी इस इलाके जंगलों में पाए जाते थे। अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र से सियार लोमड़ी और भेड़िया अब पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं। सियार और खरगोश की संख्या भी तेजी से कम हो रही है और इनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
विज्ञापन
एएमयू - फोटो : संवाद
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अलीगढ़ जिले में एक शताब्दी वन्य जीवों की संख्या और उनके पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव आया है। कभी यहां पाए जाने वाले भेड़िया और लोमड़ी अब विलुप्त हो चुके हैं। कई अन्य प्रजातियां भी विलुप्ति के कगार पर है। सियार और खरगोश जैसे जीव भी लगातार कम हो रहे हैं।

विज्ञापन


यह खुलासा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के वन्य जीव विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा पिछले चार साल किए जा रहे एक अध्ययन में हुआ है। अध्ययन अभी तीन से चार साल और चल सकता है। एएमयू के वन्य जीव विभाग के वैज्ञानिक प्रो. अफीफउल्लाह और उनकी पांच सदस्यीय टीम ने इस अध्ययन सन 1900 में प्रकाशित गजट को आधार बनाया है।

अलीगढ़ गजेटियर में तेंदुए को देखे जाने का भी जिक्र है। साथ ही नीलगाय की संख्या बेहद कम होने का जिक्र है। भेड़िया, लोमड़ी, सियार, जंगली सूअर भी इस इलाके जंगलों में पाए जाते थे। अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र से सियार लोमड़ी और भेड़िया अब पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं। सियार और खरगोश की संख्या भी तेजी से कम हो रही है और इनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इनकी संख्या को लेकर अभी गणना चल रही है लेकिन अनुमान है कि यह गिनती के ही बचे हैं।

विज्ञापन
Trending Videos
विज्ञापन

कुछ वन्य जीवों की संख्या में वृद्धि

प्रारंभिक रुझानों से यह भी पता चला है कि कुछ वन्य जातियां ऐसी भी हैं जिनकी संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। इनमें मुख्य रूप से नीलगाय और ब्लैक बक (काला हिरण) शामिल हैं। महज 10 साल पहले इनकी संख्या 250 से 350 के आसपास थी जो अब 2250 तक पहुंच गई है। नीलगाय का आंकड़ा जुटाया जा रहा है।

पक्षियों की स्थिति चिंताजनक
वन्य जीवों के साथ-साथ पक्षियों की संख्या पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। भाट तीतर अब गंगा और यमुना के खादर में नहीं पाया जाता। इसी तरह, काला तीतर और हुदहुद (हूप) जैसे पक्षियों की संख्या भी काफी कम हुई है।

क्यों आया है यह बदलाव
प्रो. अफीफउल्लाह कहते हैं अलीगढ़ में कभी वन क्षेत्र नहीं रहा। कभी पिसावा में थोड़ा वन क्षेत्र था, अब वह भी नहीं है। एक शताब्दी में नदियां भी विलुप्त हुईं। ईशन नदी, सेंगर नदी, नीम नदी जैसी नदियां विलुप्त हुईं। काली नदी भी अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। इसका भी प्रभाव वन्य जीवन पर पड़ा है। इसके साथ ही ऊसर भूमि भी कम हुई है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें