एसआईटी ने पकड़ा मामला
एसआईटी की पड़ताल में डिप्टी कलेक्टर विनीत मिश्रा को सीधे तौर पर दोषी पाया गया, जिसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया। शासन के अनु सचिव मनीष कुमार सिंह के मुताबिक अलीगढ़ के डीएम को आधिकारिक पत्र भेजकर शिकायती पत्र में दर्ज हर एक प्रतिकूल बिंदु की नियमानुसार जांच करने को कहा है। शासन ने साफ कर दिया है कि इस बार जांच निष्पक्ष हो और जल्द से जल्द इसकी रिपोर्ट लखनऊ भेजी जाए।
सस्ते आशियाने का सपना बना विवादों का अखाड़ा
सरकारी कर्मचारियों को सस्ते और रियायती दामों पर भूखंड देने के लिए साल 1995 में राज्य कर्मचारी विकास लोक सहकारी आवास समिति की नींव रखी गई थी। मकसद नेक था, किस्तों पर जमीन देकर कर्मचारियों का घर बसाना। शुरुआती दो योजनाएं तो सफल रहीं, लेकिन इसकी तीसरी महत्वाकांक्षी योजना कयामपुर ऐसी उलझी कि आज यह समिति बड़े घोटालों और विवादों के केंद्र में आ खड़ी हुई है।
तीन योजनाएं और 650 भूखंडों का पूरा खाका
इस समिति के सफरनामे में अब तक तीन बड़ी आवासीय योजनाएं शामिल रही हैं। इनमें से दो सफल रहीं, लेकिन तीसरी विवादों की भेंट चढ़ गईं। किशनपुर आवासीय योजना पूरी तरह सफल रही। इसमें 200 भूखंड विकसित कर कर्मचारियों को दिए गए। एटा चुंगी धनीपुर योजना के तहत 50 भूखंड सफलतापूर्वक आवंटित किए गए। तीसरी कयामपुर आवासीय योजना समिति का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट था। इसमें 400 भूखंड प्रस्तावित थे, लेकिन यही प्रोजेक्ट आज सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है।
किसान, संघर्ष समिति और घोटाले का त्रिकोण
आखिर कयामपुर योजना क्यों फेल हुई और विवाद कहां से शुरू हुआ? इसे तीन बिंदुओं में समझिए... कयामपुर योजना की जमीन को लेकर समिति और स्थानीय किसानों के बीच ठन गई। यह कानूनी और जमीनी विवाद इतना बढ़ा कि योजना धरातल पर उतर ही नहीं सकी। जिन कर्मचारियों ने जीवनभर की कमाई इस उम्मीद में लगा दी थी कि उन्हें कयामपुर में प्लॉट मिलेगा, उन्हें मायूसी हाथ लगी। ठगे गए इन पीड़ितों ने अब अपनी एक अलग संघर्ष समिति बना ली है। यह संघर्ष समिति अब सीधे राज्य सरकार द्वारा गठित संचालन समिति के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। लगातार हो रही शिकायतों के बाद अब इस तीसरी योजना में बड़े घोटाले की परतें खुल रही हैं, जिससे यह विवाद लगातार तूल पकड़ता जा रहा है।