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अलीगढ़ः हिंदी भाषा विचारों को प्रकट करने का सरल व सहज माध्यम : जिलाधिकारी 

Thu, 06 Aug 2020 08:17 PM IST
राजेश सिंह न्यूूज डेस्क, राहुल दक्ष, अलीगढ़।
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चंद्रभूषण सिंह। - फोटो : neeraj
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हिंदी भाषा विचारों को प्रकट करने का सरल और सहज माध्यम है। मगर, वर्तमान स्थिति को देखकर दिल दुखी होता है कि बच्चे अंग्रेजी की दौड़ में लगे हैं और अपनी मातृभाषा में पिछड़ रहे हैं। यह अभिभावकों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को अपनी मातृभाषा से जोड़ें।
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यह बात अलीगढ़ के जिलाधिकारी चंद्रभूषण सिंह ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत अमर उजाला से खास बातचीत में कही। बोले- यह सुखद है कि अंग्रेजी माध्यम के इस दौर में पिछड़ रही हिंदी भाषा को सहेजने के लिए न सिर्फ समाजसेवी, बल्कि लोक प्रशासक भी आगे आ रहे हैं। वह हिंदी माध्यम से पढ़ाई कर मिली सफलता को नजीर के तौर पर युवाओं के सामने पेश कर रहे हैं और उन्हें हिंदी के प्रति प्रोत्साहित भी कर रहे हैं। 


प्रतापगढ़ जिले की बहुंचरा ग्राम सभा के रहने वाले आईएएस अधिकारी चंद्रभूषण सिंह की छवि कड़क प्रशासक और अच्छे लोकसेवक के रूप में है। प्रतापगढ़ से लेकर अलीगढ़ तक के सफर का श्रेय वह अपनी मातृभाषा हिंदी को देते हैं।
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चंद्रभूषण सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने गांव बहुंचरा स्थित महात्मा गांधी इंटर कॉलेज से हिंदी माध्यम में पढ़ाई कर 1981 में 71.90 प्रतिशत अंकों के साथ 10वीं और 1983 में 70.80 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। हाईस्कूल में उनको हिंदी में 75 प्रतिशत अंक मिले थे। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई की। 


स्नातक की पढाई के दौरान ही उनके मन में प्रशासनिक सेवा में जाकर देश के लिए काम करने की उमंग उठी। इसके लिए वह जी जान से जुट गए। शुरुआत में मन में थोड़ा भय था, क्योंकि उस समय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी के लिए इंटरनेट जैसे माध्यम नहीं थे, जिस पर हिंदी और अंग्रेजी में परीक्षा सामग्री मौजूद हो। किताबें सीमित थीं। उनमें भी अधिकांश अंग्रेजी में थीं, लेकिन उनको देखकर हार नहीं मानी। बल्कि, अंग्रेजी में अध्यायों को पढ़ने के बाद वह उनके हिंदी में नोट्स तैयार करते थे।  


कई बार मन में सवाल आया कि हिंदी के बजाय अंग्रेजी में परीक्षा दी जाए तो शायद कॉपी जांचने वाला अंग्रेजी से प्रभावित होकर अच्छे अंक दे दे। मगर, हिंदी भाषी होने को गौरव मानकर हिंदी में ही परीक्षा देने की तैयारी में जुट गए। 1989 में उप्र पीसीएस परीक्षा के लिए आवेदन किया।

1990 में परीक्षा हुई। प्रारंभिक से लेकर मुख्य परीक्षा तक हिंदी में दी और 75 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए। साक्षात्कार भी हिंदी में ही दिया। चयन समिति ने लिखित परीक्षा के अच्छे अंक और साक्षात्कार में दिए जवाबों से खुश होकर चयन किया। 1991 में नौकरी की शुरूआत हुई। 2014 में शासन ने आईएएस के तौर पर प्रोन्नति दी।

पिता ने पैदा किया हिंदी के प्रति लगाव 
आईएएस चंद्रभूषण सिंह बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय बद्री नारायण सिंह हिंदी भाषा को बेहद पसंद करते थे। उन्होंने ही हिंदी के प्रति अनुराग जगाया और उनकी प्रेरणा से प्रशासनिक सेवा में जाने का मौका मिला। हिंदी भाषा विचारों को प्रकट करने का सरल और सहज माध्यम है। मगर, वर्तमान स्थिति देख दिल दुखी होता है कि बच्चे अंग्रेजी की दौड़ में लगे हैं और अपनी मातृभाषा में पिछड़ रहे हैं। यह अभिभावकों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को अपनी मातृभाषा से जोड़ें। 

हिंदी को सहेजने के लिए अधीनस्थों से हमेशा कहते हैं  
चंद्रभूषण सिंह ने बताया कि हिंदी को बढ़ावा के लिए अपने कर्मचारियों और अधीनस्थ अधिकारियों को हमेशा कहते हैं। खासकर पत्राचार से लेकर बैठकों में भाग लेते समय अधिक से अधिक हिंदी का प्रयोग करने की नसीहत भी देते हैं। चंद्रभूषण सिंह बताते हैं कि उनके बच्चे जब भी उनसे बात करते हैं, तो वह उनसे हिंदी में ही संवाद करते हैं। देश में कई प्रशासक और शासक हुए हैं, जिन्होंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की और वह अपने प्रशासनिक कामकाज में सफल रहे। इसलिए आज की नौजवान पीढ़ी को हिंदी को नहीं भूलना चाहिए।
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