खिरनीगेट स्थित दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे चार्तुमास में बृहस्पतिवार को जैन मुनि आचार्य निर्भय सागर महाराज ने कहा कि श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था को श्रद्धा कहा जाता है। आस्था जब सिद्धांत से व्यवहार में आती है तब उसे निष्ठा कहा जाता है। जब निष्ठा व्यक्ति के जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तब श्रद्धा का रूप ले लेती हैं। श्रद्धा एक गुण है जो व्यक्ति के सद्गुणों, सद् विचारों और उत्कृष्ट विशिष्टताओं के आधार पर उसे श्रेष्ठता प्रदान करता है।
कहा कि कर्म, ज्ञान और उपासना या भक्ति का मूल श्रद्धा ही है। श्रद्धा से सत्संग, पारस्परिक सद्भाव, स्नेह, आदर और सहयोग के संवर्द्धन के साथ ही समाज में बिखराव पर नियंत्रण और एकत्व की भावना में वृद्धि होती है। समग्र सृष्टि भगवान की ही अभिव्यक्ति है। श्रद्धावान व्यक्ति ही भगवान को प्राप्त कर सकता है। कार्यक्रम का शुभारंभ यतेंद्र मोहन सिंह जैन, सुनीता जैन परिवार ने चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन शास्त्र भेंट, पाद प्रक्षालन कर किया। संचालन अंशुल जैन ने किया। आयोजन में मुनि सेवा समिति के अध्य्क्ष प्रद्युम्न कुमार जैन, मंत्री विजय कुमार जैन सेठ संस, कोषाध्यक्ष नरेंद्र कुमार जैन, मीडिया प्रभारी मयंक जैन, पूर्व एमएलसी जगवीर किशोर जैन, कैलाश चंद्र जैन, ओमप्रकाश जैन, राजा जैन, प्रकाश जैन, धर्मेंद्र जैन पाटनी आदि का सहयोग रहा।