जोंक थेरेपी से एक महीने की बच्ची का पैर कटने से बच गया। टीकाकरण के दुष्प्रभाव से उसके पैर का पंजा काला हो गया था। डॉक्टर ने जैसे ही घुटने के नीचे का पैर काटने की बात कही, परिजन परेशान हो गए। परिचित के बताने पर परिजन बच्ची को लेकर एएमयू के एके तिब्बिया कॉलेज आए, जहां जाेंक थैरेपी से उपचार शुरू हो गया।शहर के जमालपुर के मोहम्मद इमरान की बेटी सना को जन्म के बाद टीका लगाया गया, लेकिन टीका रिएक्शन कर गया। उसका उपचार कराया गया, लेकिन आराम होने की बजाय बीमारी बढ़ रही थी। डॉक्टर ने कहा कि बच्ची के घुटने के नीचे का हिस्सा काटना पड़ेगा, वर्ना बीमारी बढ़ती जाएगी और पूरा पैर चपेट में आ सकता है। डॉ. मोहम्मद शोएब ने बच्ची का जोंक थेरेपी से इलाज शुरू किया। उन्होंने कहा कि एक हफ्ते में दो बार जोंक थेरेपी दी जाने लगी। इसके बाद उसे आराम होने लगा। दो महीने के इलाज बाद उसका पैर कटने से बच गया, लेकिन पंजे की अंगुलियां काटनी पड़ी। अब बेटी ठीक है।
इस तरह होता है उपचार
इस थेरेपी में जब शरीर पर जोंक लगाया जाता है तो ये वहां चिपक जाती है जहां पर गंदा खून होता है। 15-20 मिनट में ये शरीर से गंदा खून चूसती है और मोटी होती जाती है। इसके बाद अपने आप साइड हो जाती है। गांठ, ट्यूमर और सिस्ट जैसी बीमारियों के लिए लीच थेरेपी बहुत कारगर है।
जोंक बैंक में 500 जोंक लाने की तैयारी
तिब्बिया कॉलेज में जोंक बैंक है, जिसमें 150 जोंक है। जोंक बैंक प्रभारी डॉ. मोहम्मद शोएब कहते हैं कि अब 500 जोंक लाने की तैयारी है।