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देशी शराब के ठेके से भरे नमूने में हुई मिथाइल अल्कोहल की पुष्टि

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जहरीली शराब मामले में आबकारी विभाग की मेरठ स्थित प्रयोगशाला से बड़ा खुलासा हुआ है। आबकारी विभाग के लाइसेंसी देशी शराब के ठेके से भरे गए नमूने की जांच में मिथाइल अल्कोहल की पुष्टि हुई है। इससे साफ है कि जहरीली शराब लाइसेंसी दुकानों से बिकी है। मगर, बड़ा सवाल यह है कि आखिर 28 मई के बाद जिन दुकानों को एसडीएम व आबकारी अधिकारियों ने जांचा, उनमें नकली शराब क्यों बरामद नहीं हो सकी। आखिरी इतनी बड़ी मात्रा में नकली शराब को कहां खपा दिया गया।
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शुक्रवार सुबह जहरीली शराब से मौत के बाद आबकारी विभाग और प्रशासन की टीम करसुआ गांव में पहुंची थी। वहां पर देशी शराब के ठेकों से तीन नमूने भरे गए। इनको जांच के लिए मेरठ स्थित आबकारी विभाग की प्रयोगशाला भेजा गया। सोमवार दोपहर वहां जांच के बाद इस बात की पुष्टि की गई कि इस शराब में मिथाइल अल्कोहल मिला है। इससे अधिकारियों के होश उड़ गए हैं। हैरानी की बात यह है कि किसी भी ठेके से यह शराब बरामद नहीं हो रही है। जबकि शनिवार को इसका गोदाम तक पकड़ा जा चुका है। संयुक्त आबकारी आयुक्त आगरा ने मेरठ से आई जांच रिपोर्ट की पुष्टि की।
सस्ते के लालच में जहर परोस दिया
आबकारी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, शराब एथाइल अल्कोहल से बनती है। इसके लिए सिर्फ डिस्टलरी को लाइसेंस जारी होता है। उत्तर प्रदेश में करीब 35 लाइसेंस है, जबकि मिथाइल अल्कोहल का उपयोग औद्योगिक उपयोग है। तमाम कारखानों, रंग-पेंट में मिलाने, पायल की झलाई आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका उत्तर प्रदेश में किसी के पास लाइसेंस नहीं है। यह बंगाल से सप्लाई होती है। शराब बनाने में इस्तेमाल होने के चलते एथाइल अल्कोहल पर 70 से 80 प्रतिशत की ड्यूटी है। जबकि मिथाइल अल्कोहल पर सामान्य ड्यूटी है। यानी मिथाइल अल्कोहल सस्ती उपलब्ध हो जाती है। अब अलीगढ़ में बनी नकली शराब में इसकी पुष्टि होने के बाद अधिकारियों ने अंदेशा जताया है कि मिथाइल अल्कोहल का उपयोग इसीलिए किया गया है कि यह सस्ती होती है। इसे बनाने वाले लालच में आ गए। वह अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में लोगों के जीवन के साथ खेल गए।
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