तापीय बिजली परियोजना के ऐश ड्रम से उड़ रही राख समीप के गांव नगौला व रामपुर के निवासियों के जीवन पर पर भी परत बनकर चढ़ी हुई है। करीब 6 हजार की आबादी वाले गांव नगौला में घरों के अंदर कमरों तक में यह राख घुस रही है। गांव के 50 से अधिक लोग टीबी, दमा व सांस के रोग जैसी बीमारियों की चपेट में हैं।
तापीय परियोजना कासिमपुर पावर हाउस से पाइपों के जरिए पानी के साथ राख बहकर गांव नगौला के समीप बने ऐश ड्रमों तक पहुंच रही है। यहां से पानी छनकर पाइपों के जरिए गंग नहर में जा रहा है और मैदान में जमा होता रहता है राख का ढेर। सूखते ही यह राख थोड़ी सी हवा के साथ उड़कर ग्राम नगौला व रामपुर की गलियों व घरों के अंदर कमरों तक में पहुंच रही है। ग्रामीणों के अनुसार घरों में रोजाना एक से दो इंच तक राख सामान में जम जाती है। खाने-पीने के सामने में भी यह राख मिल रही है। वहीं राख की वजह से सांस लेने में परेशानी हो रही है।
वहीं ग्रामीणों का कहना है कि उड़कर खेतों की मिट्टी में राख पहुंचने से फसल चौपट हो जाती है। इससे खेतों में खाने भर का अनाज पैदा नहीं हो पा रहा है। इसी के विरोध में 21 मई से गांव के निवासी ऐश ड्रम के पास स्थित शिव मंदिर में धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। राख से निजात दिलाने व गांव में 24 घंटे बिजली की उनकी मांग है लेकिन अभी तक परियोजना से जुड़े किसी अधिकारी ने उनसे संपर्क तक नहीं किया। वहीं जनप्रतिनिधियों के भी धरनास्थल पर न पहुंचने से यह ग्रामीण खासे नाराज हैं। तापीय परियोजना के महाप्रबंधक सुनील कुमार सिंह से इस बाबत फोन पर बात करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।
नगौला में टीबी व सांस के रोगी
भगवान सिंह, सुरेश चंद, जयचंद गिरि, कंछी गिरि, हमीद खां, रनवीर सिंह, लाखन सिंह, मुकेश राघव, मुन्नालाल, धर्मपाल, जसवंत, थान सिंह, दीप चंद, कांति देवी, नत्थीराम, डालचंद आदि करीब 50 लोग।
- करीब 15 साल पहले राख का जबसे प्रकोप शुरू हुआ तबसे एक्यूट ब्रोनकाइटिस (श्वांस नली की बीमारी जिसमें लगातार खांसी होती रहती है) से ग्रस्त हूं। सीएचसी समेत निजी डॉक्टरों से इलाज करवाया लेकिन राख के कारण कोई फायदा नहीं हुआ है। - तेजप्रकाश गिरि, पूर्व प्रधान नगौला।
- पहले मैं पूरी तरह से स्वस्थ था। खेतों, गांव में उड़ रही राख के कारण करीब तीन साल से श्वांस की बीमारी से परेशान हूं। सीएचसी के साथ के साथ ही निजी डॉक्टरों से काफी इलाज करवाया है, लेकिन दवाएं काम नहीं कर रही हैं। - हरप्रसाद, ग्रामीण, नगौला।
- करीब दो साल पहले मुझे टाइफाइड हुआ था। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराने पर डॉक्टर ने टीबी की बीमारी बताई। तभी सीएचसी में टीबी का इलाज चल रहा है। अभी तक इस रोग से पूरी तरह से निजात नहीं मिल सकी है। -नेत्रपाल सिंह, नगौला।
- फेफड़ों में राख जमा होने से मुझे टीबी व सांस की बीमारी हो गई। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच में टीबी की बीमारी बताई गई। काफी इलाज कराने के बाद टीबी की बीमारी से राहत महसूस हो रही है, लेकिन सांस लेने में आज भी परेशानी हो रही है। - हरिओम गिरि, नगौला।
यह राख इतनी बारीक होती है कि सांस लेने के साथ ही शरीर के अंदर चली जाती है और फेफड़ों में जम जाती है। इससे अस्थमा, उच्च रक्तचाप, टीबी, ब्रोनकाइटिस, एम्फाजिमा, सिस्टिक फाइब्रोसिस, एआरडीएस जैसी खतरनाक बीमारियां हो जाती हैं। सबसे अधिक खतरा नवजात शिशुओं को रहता है। -डॉ. अंकित सिंह, अधीक्षक, सीएचसी जवां।