किसान पवन खेत में बेल से तोरई तोड़कर दिखाते हुए। संवाद
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नौकरियों में बढ़ते संकट और बेरोजगारी के बढ़ते ग्राफ को देखते हुए एमएससी (जूलॉजी) कर चुके युवक ने नौकरी में संभावना तलाशने के बजाय परंपरागत खेती को ही कारोबार के रूप में चुनकर आजीविका का माध्यम बना लिया है। युवा किसान पवन खेती से पहले गाजियाबाद में एक नामचीन डेयरी कंपनी में नौकरी करते थे लेकिन जब मेहनत के एवज में पर्याप्त मेहनताना नहीं मिला तो खेत और उसकी मेड़ों को ही तरक्की का रास्ता बना लिया। एक खेत में चार तरह की फसलें उगाकर पवन अब नौ लाख रुपये सालाना तक कमा लेते हैं।
कस्बे के मोहल्ला मुबारिक निवासी पवन पुत्र वेदराम ने बताया कि कोरोना से पहले गाजियाबाद में अमूल कंपनी में सुपरवाइजर का काम करते थे। इसके एवज में करीब 20 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते थे, लेकिन इतने वेतन से संतुष्टि नहीं मिली। इसके बाद वह जलाली लौट आए और पिता के साथ खेती करके सालाना लगभग आठ से नौ लाख रुपये कमा लेते हैं। पवन के पिता पर आठ बीघा खेत है जबकि करीब 30 बीघा खेत पट्टे पर ले रखा है। इन दिनों पवन ने खेत में तोरई कर रखी हैं। इसके बीच मेड़ पर हाइब्रिड अमेरिकन भुट्टा कर रखा है। साथ ही पानी वाली क्यारी में उड़द और मूंग कर रखी हैं।
पवन ने बताया कि चार तरह की फसल से नुकसान होने की गुंजाइश कम रहती है। यदि दो फसलों में नुकसान हो जाता है, तो बाकी दो फसलों से घर चलता रहता है। इसके अलावा मेड़ पर मक्का बोने के पीछे एक वजह ये भी है कि तोरई की बेल मक्के के पौधे पर चढ़ जाती है जिससे तोरई साफ और चमकीली दिखाई पड़ती है और तोड़ने में भी आसानी होती है। वर्तमान में तोरई 30 से 32 रुपये किलो तक में बिक रही है।