दो अप्रैल से विक्रम नव संवत्सर 2079 शुरू हो रहा है। इसे हिंदू नववर्ष भी कहा जाता है। इसके साथ ही चैत्र नवरात्र भी शुरू हो जाएंगे। पहले दिन घट स्थापना के लिए सुबह शुभ चौघड़िया मुहूर्त है। जो सुबह 7:45 से लेकर 9:15 बजे तक है।
ज्योतिष आचार्यों ने बताया कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिंदू नववर्ष प्रारंभ होता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ था। इस दिन से ही कालगणना प्रारंभ हुई थी। सतयुग का प्रारंभ भी इसी दिन से माना जाता है। चैत्र नवरात्र भी दो अप्रैल से शुरू हो रहे हैं। इस बार देवी मां अपने प्रिय भक्तों के यहां घोड़े पर सवार होकर आएंगी। नौकरी पेशा लोग एवं बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए घट स्थापना करना अति शुभ और उन्नति कारक रहेगा। 11:15 बजे से अभिजीत मुहूर्त भी प्रारंभ हो जाएगा। यह मुहूर्त व्यापारियों, नौकरी पेशा, विवाह शादी एवं परीक्षार्थी के शुभ है।
घट स्थापना कैसी करनी चाहिए
नवरात्र में घट स्थापना का बहुत महत्व है। पहले स्थापित होने वाले कलश के मुख में भगवान विष्णु गले में रुद्र मूल में ब्रह्मा तथा मध्य में देवी शक्ति का निवास माना जाता है। नवरात्र के समय ब्रह्मांड में उपस्थित शक्तियों का घट में आह्वान करके उसे कार्यरत किया जाता है। इससे घर की सभी विपदा दायक तरंगें नष्ट हो जाती हैं तथा घर में सुख शांति-समृद्धि बनी रहती है।
घट स्थापना की सामग्री
जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र, शुद्ध साफ मिट्टी एकत्रित कर लें। कलश में भरने के लिए शुद्ध जल, गंगाजल, रोली, मौली, पूजा में काम आने वाली सुपारी, कलश में रखने के लिए सिक्का, आम के पत्ते, कलश ढकने के लिए सकोरा ले लें। सकोरा में रखने के लिए साबुत चावल, नारियल, लाल कपड़ा, फूल माला, फल, मिठाई, दीपक, धूप व अगरबत्ती भी सामग्री में शामिल रहेगी।
घट स्थापना की विधि
सबसे पहले जौ बोने के लिए एक ऐसा पात्र लें। जिसमें कलश रखने के बाद भी आसपास जगह रहे। यह पात्र मिट्टी की थाली जैसा कुछ हो तो श्रेष्ठ होता है। इस पात्र में जौ उगाने के लिए मिट्टी की एक परत बिछा दें। मिट्टी भी शुद्ध होनी चाहिए। पात्र के बीच में कलश रखने की जगह छोड़कर बीज डाल दें। फिर एक परत मिट्टी की बिछा दें। एक बार फिर जौ डालें। फिर से मिट्टी की परत बिछाएं। अब इस पर जल का छिड़काव करें। कलश तैयार करें। कलश पर स्वस्तिक बनाएं। कलश के गले में कलावा बांधें। अब कलश को थोड़े गंगा जल और शुद्ध जल से पूरा भर दें। कलश में साबुत सुपारी, फूल और सिक्का डालें। अब कलश में पत्ते डालें। कुछ पत्ते थोड़े बाहर दिखाई दें। इस प्रकार लगाएं। चारों तरफ पत्ते लगाकर सकोरा रख दें। सकोरे को चावल से भर दें। नारियल तैयार करें। नारियल को लाल कपड़े में लपेट कर कलावा बांध दें। इस नारियल को कलश पर रखें। नारियल का मुंह आपकी तरफ होना चाहिए। यदि नारियल का मुंह ऊपर की तरफ हो तो उसे रोग बढ़ाने वाला माना जाता है। नीचे की तरफ शत्रु बढ़ाने वाला मानते हैं। पूर्व की और हो तो धन को नष्ट करने वाला मानते हैं। नारियल का मुंह वह होता है। जहां से वह पेड़ से जुड़ा होता है। अब यह कलश जौ उगाने के लिए तैयार किए गए पात्र के बीच में रख दें।
दो अप्रैल से शुरू हो रहे नववर्ष में चैत्र नवरात्र में सर्वाधि सिद्धि योग और रवियोग का विशेष संयोग मिल रहा है। मां दुर्गा के स्वरूपों की पूजा करने से दो गुना फल की प्राप्ति होगी।
पं. कृष्ण कुमार शास्त्री, ज्योतिष आचार्य, श्री मंगलकारी बालाजी मंदिर तालानगरी
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नवरात्र में बहुत से लोग आठ दिनों के लिए व्रत रखते हैं। इन दिनों केवल फलाहार का सेवन करते हैं, जिसका अर्थ है फल एवं कुछ विशिष्ट सब्जियां। सेंधा नमक का इस्तेमाल किया जाता है। दस अप्रैल को रामनवमी के दिन व्रत का पारण किया जाएगा।
पं. हृदय रंजन शर्मा, अध्यक्ष श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान