आफताब अहमद खां (फाइल फोटो)
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इसके बाद वह आजादी के लिए गांधी जी के आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने आगरा में गधापाड़ा का रेलवे पुल बम से उड़ाया था। सेठ अचल सिंह व ज्वाला प्रसाद जुज्ञासी के साथ वह आगरा जेल में बंदी रक्षक के पद पर भी रहे। देशवासियों को जेल में यातनाओं का उन्होंने विरोध किया तो तबादला अलीगढ़ कर दिया गया।
जेल में ही एक बार अंग्रेज सिपाहियों ने उनकी हाथ की हड्डी व पसली तक तोड़ दीं, फिर भी उनका आजादी का जुनून कम नहीं हुआ। जेल में बंदियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजी सिपाहियों को पीटा और भाग गए। इसके बाद उन्होंने दीनापुर में पूर्व विधायक स्व. बाबू सिंह यादव के यहां फरारी काटी।
आफताब अहमद खां अतरौली के पूर्व विधायक रहे डॉ. अनवार खां के मौसेरे भाई थे। पूर्व विधायक ने जब उनके इंतकाल का समाचार सुना तो उनके भी आंसू छलक पड़े।
कासिफ अमर उजाला आया क्या...
आफताब अहमद खां को अमर उजाला से बेहद लगाव था। वह अमर उजाला समाचार पत्र ही पढ़ने के शौकीन थे। उनके नाती कासिफ चौधरी (प्रधानाचार्य) बताते हैं कि सुबह उठते ही दादा उनसे अमर उजाला मांगते थे। अमर उजाला पढ़ने के बाद ही दूसरे अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालते थे।
तीन बेटों का भरा पूरा परिवार
आफताब अहमद खां का तीन बेटों का भरा पूरा परिवार है। बड़े बेटे जमशेद खां मुंबई में कारोबार करते हैं। मुख्त्यार सलीम खेती व मुजम्मिल अहमद यूपी पुलिस में हैं। दो बेटी जैनब व जुबैदा हैं। सभी की शादी हो गई। जैनब का कुछ समय पहले इंतकाल हो गया। नाती मुरसलिम भी यूपी पुलिस में हैं।