राधेश्याम रामायण का पाठ करते हुए कैलाश चंद्र व उनकी धर्मपत्नी नीलम
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श्रीराम के जन्म से सतवन्ती सीता की विजय तक लिखी गई राधेश्याम रामायण का नाम आपने कम सुना होगा, लेकिन यह रामायण हिन्दी, उर्दू, अवधी और ब्रजभाषा के आम शब्दों के साथ एक विशेष गायन शैली में रचित है, जिसे प्रसिद्ध साहित्यकार पंडित राधेश्याम कथावाचक ने रचा, उनके जीवन काल में ही इसकी हिन्दी व उर्दू में पौने दो करोड़ से अधिक प्रतियां छपी और बिकीं।
आगरा रोड स्थित पड़ियावली निवासी 65 वर्षीय कैलाश चंद्र बचपन से ही राधेश्याम रामायण पढ़ी। अतरौली के गांव माढ़पुर के स्कूल में जब वह कक्षा 6 में पढ़ते थे, तब उनके शिक्षक शोभाराम सक्सेना राधेश्याम रामायण पढ़ते थे। उनको पढ़ता देख कैलाश चंद्र ने भी पढ़ना शुरू किया, फिर इसमें ऐसे रमे कि अब तक इसका पाठ कर रहे हैं। वह विगत 10 साल से इसका पाठ मंदिर आदि जगहों पर निशुल्क करते आ रहे हैं। अब उन्हें यह चिंता सता रही है कि सभी घरों में रामचरितमानस का पाठ तो होता है, पर राधेश्याम रामायण को लोग भुला बैठे हैं। कैलाश चंद्र अपनी पत्नी नीलम, पुत्र मनोज व तीन साल के नाती जागेश के साथ राधेश्याम रामायण के प्रचार-प्रसार के लिए घूमते हैं। उन्हें चिंता सताती है कि यह रामायण कहीं अतीत के पन्नों में न खो जाए।
राधेश्याम रामायण के बारे में
प्रसिद्ध साहित्यकार पंडित राधेश्याम कथावाचक मूलरूप से बरेली के रहने वाले थे। उन्होंने केवल 17-18 वर्ष की उम्र में ''राधेश्याम रामायण'' की रचना 1905 से 1915 के बीच की। बताया जाता है कि यह उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों की रामलीलाओं में उपयोग की जाती है। पंडित राधेश्याम कथावाचक के जीवनकाल में ही इसकी करोड़ों प्रतियां बिक चुकी थीं। राधेश्याम रामायण कुल 25 भागों (खंडों) और 8 काण्डों में विभाजित है। इसमें श्रीराम के जीवन को बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड, अरण्य काण्ड, किष्किंधा काण्ड, सुन्दर काण्ड, लंका काण्ड, उत्तरकाण्ड व लवकुश काण्ड में ही विभक्त किया गया है। राधेश्याम रामायण की शुरुआत श्रीराम के जन्म से हुई है और समापन सतवन्ती सीता की विजय से हुआ है। इस रामायण में श्रीराम की कथा का वर्णन बड़े ही मनोहारी ढंग से किया गया है।
नेपाल की सरकार से कथावाचस्पति पदवी मिली
नेपाल के इतिहास में 1846 से 1951 तक चले राणा शासन की श्री 3 सरकार (श्री तीन सरकार) के नाम से जाना जाता है। राधेश्याम रामायण के लेखक राधेश्याम कथावाचक को नेपाल की श्री 3 सरकार से कथावाचस्पति की पदवी मिली। साथ ही कीर्तनकलानिधि, काव्यकलाभूषण, श्री हरि कथा विशारद व कविरत्न भी इनको मिली।