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वर्क परमिट और शरणार्थी के रूप में कई रोहिंग्या अलीगढ़ में पाए हुए हैं शरण

Thu, 07 Jan 2021 01:11 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, अलीगढ़
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म्यांमार से भागकर भारत पहुंचे हजारों रोहिंग्या परिवारों का एक बड़ा धड़ा अलीगढ़ की मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की धुरी बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्क परमिट और शरणार्थी के रूप में करीब 85 परिवारों के 400 से 500 रोहिंग्या शरणार्थी अलीगढ़ में रहकर यहां की मीट इंडस्ट्री में रोजगार पा रहे हैं। हालांकि इनका रहन सहन इलाके विशेष में है। फैक्ट्रियों के सिवाय इनकी गतिविधियां अन्य कहीं नहीं पाई जातीं।
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मगर सुरक्षा कारणों पर गौर करें तो इनकी आड़ में देश विरोधी ताकतों के आकर छिपने और इनके द्वारा किसी भी समय वोटर कार्ड से लेकर भारतीय नागरिकता संबंधी अन्य दस्तावेज बनवाए जाने का अंदेशा बना रहता है। इसे लेकर खुफिया तंत्र सक्रिय रहता है और समय-समय पर निगरानी भी रहती है। खुद एसएसपी मुनिराज जी कहते हैं कि खुफिया टीम समय-समय पर इनकी अपडेट लेती रहती है।

पांच साल तक बढ़ी इनकी संख्या

अलीगढ़ में 2012 के आसपास रोहिंग्या परिवारों का आना उस समय शुरू हुआ, जब यहां मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की जड़ जमना शुरू हुई। उस समय यह चंद परिवार गोंडा रोड के कमेला व गोंडा रोड के बाईपास की मीट फैक्ट्रियों में ही रहा करते थे। मगर धीरे-धीरे मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के हब कहे जाने वाले मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और यहां मीट कारोबार से जुड़े स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर लिया।
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इस तरह अब तक मकदूम नगर में तकरीबन 300 से 400 लोग यहां आकर बस गए। इसके अलावा करीब एक-एक दर्जन परिवार भुजपुरा व शाहजमाल में भी रह रहे हैं। इस तरह इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। एक एनजीओ के सर्वे के अनुसार यहां 1 हजार के करीब रोहिंग्या शहर की इन बस्तियों में रह रहे हैं। हालांकि 2017-18 के बाद से नए लोग नहीं आ रहे हैं।

मीट इंडस्ट्री रोजगार का मुख्य साधन

मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की मजबूरी यह है कि पश्चिमी देशों में रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक रहती है। यह मीट कटिंग में एक्सपर्ट होते हैं। इनके हाथ से कटे हुए मीट की विदेशी बाजार में बेहद मांग रहती है। इसलिए मीट इंडस्ट्री में इन कर्मचारियों की मांग भी अधिक रहती है। यही वजह है कि इन्हें आसानी से यहां की फैक्ट्रियों में रोजगार मिल जाता है। इसके अलावा जो लोग कटिंग के पेशे से अलग हैं, उन्हें मजदूरी में लगाया जाता है। मकदूम नगर में रह रहे कुछ लोगों ने टिर्री और जुगाड़ वाहन भी बना रखे हैं। उनमें मजदूरी पर माल ढुलाई का काम करते हैं।

पूर्व पार्षद के प्लाट में संचालित है मदरसा

बेशक कई साल से रोहिंग्या इन मीट फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं। मगर इनका शहर के अन्य हिस्से से कोई नाता नहीं रहता। जो लोग मीट फैक्ट्रियों के अंदर या आसपास रहते हैं। उनके हर इंतजाम की जिम्मेदारी फैक्टरी मालिकान व प्रबंधक की रहती है, जो उनसे अलग बस्तियों में रह रहे हैं। वह समाज में घुल मिलकर रह रहे हैं।

यही वजह है कि मकदूम नगर में इलाके के एक पूर्व पार्षद ने अपनी खाली पड़ी जमीन रोहिंग्या परिवारों के बच्चों के लिए दे दी है, जिस पर 30 वर्षीय रोहिंग्या मो.बिलाल (आलिम-मदरसे में पढ़ाने वाले) मदरसा चलाते हैं और इनके मदरसे में 30 के करीब रोहिंग्या बच्चे पढ़ते हैं। वही पुलिस/एलआईयू और रोहिंग्या के बीच की कड़ी भी हैं।

स्थानीय पहचान पत्र बने, सीएए-एनआरसी विरोध में आए

पिछली सरकार में स्थानीय स्तर पर सियासी सहयोग से काफी संख्या में रोहिंग्या के स्थानीय पहचान पत्र भी बन गए हैं। इस बात की तस्दीक पिछले साल शहर में सीएए-एनआरसी विरोधी उपद्रव के दौरान हुई। इस उपद्रव में जब शाहजमाल ईदगाह के सामने पुलिस पर हमला हुआ था। उस हमले में कई सैकड़ा संख्या में रोहिंग्या युवक ही पुलिस पर पथराव करने वालों के रूप में चिह्नित हुए थे। हालांकि सही से नाम पते सामने न आने के कारण उन पर कार्रवाई नहीं हो सकी।
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