होलिका दहन बृहस्पतिवार को किया जाएगा। विधि विधान से होलिका पूजन करने से घर में सुख समृद्धि आएगी। शाम 06:39 बजे से लेकर रात 10:15 बजे तक होलिका दहन का सर्वोत्तम समय रहेगा।
श्री गुरु ज्योतिष शोध संस्थान के अध्यक्ष पं. हृदय रंजन शर्मा ने होलिका पूजन के विधि विधान बताए हैं, उनके अनुसार माघ की पूर्णिमा पर होली का डांडा रोप दिया जाता है। इसके लिए नगर से बाहर वन में जाकर शाखा सहित वृक्ष लाते हैं और उसको गन्धादि से पूजकर पश्चिम दिशा में खड़ा कर देते हैं। इसी को होली, होली दंड, होली का दांडा, डांडा या प्रहलाद कहते हैं। इस अवसर पर लकड़ियां तथा कंडों आदि का ढेर लगाकर होलिका पूजन किया जाता है। अपने घर में होलिका दहन करते हैं या बाहर, उसी स्थान पर जाकर होली की पूजा करनी चाहिए। घर के नजदीक जहां होली जलती हो, वहां जाकर पहले ठंडी होली का पूजन करें। गूलरी की माला होली पर चढ़ा दें। कच्चा सूत होली के चारों ओर लपेटें और बचाकर घर ले आएं। थोड़ा जल डाल दें और दीपक जला दें। पूरी, हलवा या आटा के साथ दक्षिणा ब्राह्मण को दें, जब होली जले, तब गेहूं की बालियां और पापड़ होली की ज्वाला में भून लें। होली की तीन परिक्रमा करें व जल का अर्घ्य दें। भुनी प्रसादी को घर पर आकर ग्रहण करें। होली पूजन के बाद पूजन की थाली से सभी लोग टीका लगाएं। बड़ों के पांव छूकर आशीर्वाद लें।
ये है पूजन सामग्री
- पूजन के लिए थाल में गूलरी की माला, चौमुखा दीपक, जल का लोटा, पिसी हल्दी या रोली, बताशे, नारियल, फूल, गुलाल, गुड़ की ढेली, कच्चे सूत की कुकड़ी, आठ पूरी, हलवा या आटा, दक्षिणा, गेहूं, जौ, चने की बालियां, एक कच्चा पापड़ रख लें।
घर पर होलिका पूजन का विधान
- यदि घर में होली जलाते हों तो पहले साफ जगह पर ईंटों या मिट्टी से चौकोर वेदीनुमा बना लें। आटे का चौक पूरकर थोड़ा गुलाल छिड़क दें। उसमें प्रहलाद के प्रतीक रूप एक डंडा गाढ़ दें। चारों तरफ गूलरी की माला व उपले लगा दें। जब पूजन का समय हो, तब मोहल्ले की होलिका में से अग्नि लाकर घर की होली जलाएं। अग्नि लगाते ही डंडा को निकाल लें, क्योंकि वह भक्त प्रहलाद का रूप माना जाता है। सभी लोग होली का पूजन करें। परिक्रमा लगाएं, जल छोड़कर अर्घ्य दें, बालियां और पापड़ होली की ज्वाला में भून लें।
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भस्म लगाने से सभी दोषों की होती है शांति
- होलिका दहन के दूसरे दिन होली की भस्म को अपने मस्तक पर लगाने से सभी दोषों को शांति प्राप्त होती है। होलिका दहन से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि फाल्गुन में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन जो मनुष्य सच्चे मन से हिंडोले में झूलते हुए बाल कृष्ण के दर्शन करता है। वह निश्चय ही बैकुंठ में वास करता है।
होलिका में गेहूं, जौ व चने की बालियां क्यों भूनते हैं, क्या होता है होला
- फाल्गुन में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर नवीन धान्य (जौ, गेहूं, चने) को यज्ञ रूपी भगवान को समर्पित करने का दिन है। इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ पर्व (नई फसल के अनाज का सेवन करने के लिए किया गया यज्ञ) भी कहा जाता है। होली के अवसर पर नवीन धान्य (जौ, गेहूं, चने) की खेती पककर तैयार हो जाती है। हिंदू धर्म में खेत से आए नवीन अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परंपरा है। उस अन्न को होला कहते हैं। इसीलिए फाल्गुन में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को उपले आदि एकत्र करके उसमें यज्ञ की तरह अग्नि स्थापित की जाती है, जिसे होलिका जलाना कहते हैं। फिर रोली, मिठाई से पूजन करके हवन के रूप में जौ, गेहूं, चने की बालियों को आहुति के रूप में होली की ज्वाला में सेकते हैं। होली की तीन परिक्रमा करते हैं। सिकीं हुई बालियों को घर लाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस तरह होली के रूप में नवान्नेष्टि यज्ञ संपन्न होता है। इस तरह नवीन अन्न का यज्ञ करने से मनुष्य स्वस्थ व बलवान बनता है। हृदय रंजन शर्मा ने बताया कि होलिका पूजन और विधि विधान से फाल्गुनोत्सव पर कई प्रकार की बाधाओं का नाश होता है। पुत्र, पौत्र व धन धान्य से संपन्न होते हैं।