पिछले दिनों श्रीलंका के चर्च में हुए विस्फोट के बाद बुर्के पर पाबंदी लगाने की बातें उठी हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. इरफान हबीब ने इतिहास में बुर्के का कब-कब और किस तरह जिक्र मिलता है, इस पर रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि इस्लाम में पर्दे का चलन था और है, लेकिन इस्लाम के आगाज से पहले भी यूनानी (ग्रीक) सभ्यता में पर्दादारी के पर्याप्त एतिहासिक प्रमाण मिलते हैं।
विशेष बातचीत में प्रो. इरफान हबीब ने बताया कि शुरुआती सभ्यता में पर्दा नहीं था। अरब क्षेत्रों में औरतों को काफी आजादी थी, लेकिन फिर यह शुरू हुआ कि रसूल मोहम्मद साहब के वक्त से। रसूल की पत्नियों को बाहर नहीं जाना होना था, लेकिन एक पत्नी आयशा बाहर गई थीं। हालांकि इसमें यह पूरी तरह से पता नहीं चलता कि जिसे इस्लामिक बेपर्दगी कहते हैं, वह कहां और कब शुरू हुई..? आप अगर मुगल काल की चित्रकारी देखें तो पाएंगे कि मुस्लिम औरतें पत्थर तोड़ रही हैं, चूना बना रही हैं, सूत कात रही हैं। इन्हीं चित्रों में हिंदू औरतों को भी साड़ी और लहंगे में देख सकते हैं। वह सिर तो ढके हैं, लेकिन पर्दा नहीं है। अगर आप इन तस्वीरों पर जाएं तो धार्मिक गुंजाइश यह रही कि वह औरतें जिन्हें काम करना है, मजदूरी करनी है, रोजी रोटी कमानी है, उनके लिए पर्दे पर रवैया उदार रहा। इस तरह मुसलमानों और मुगलों में महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा थी, लेकिन कुछ मामलों में चित्रकारी में उन्हें भी बिना पर्दे के दिखाया गया है।
कुछ चित्रकारी में औरतों को घोड़ों पर भी देखा जा सकता है। यह भी हुआ कि जो औरतें अमीर और सामंत परिवारों से थीं उनको पर्दे की जरूरत नहीं थी। वह जब भी बाहर जातीं तो पालकी या ऐसे ही किसी माध्यम से जातीं जो अपने आप ही पूरा ढका होता था। प्रो. हबीब कहते हैं कि यूनानी सभ्यता में मिली मूर्तियों में महिलाओं को परदे के साथ चित्रित किया गया है। जिससे ये भी संकेत मिलता है कि मानव सभ्यता के विकास में पर्दा प्रथा इस्लामिक बुरका प्रथा से पहले की है। अफगास्तिान में पैट्रिया में बहुत अच्छी औरत की मूर्ति मिली है, उसके चेहरे पर नकाब है।
इंग्लैंड में भी एक जमाने में अमीर घरों की महिलाएं जब बाहर जाती थीं तो एक किस्म का जाल चेहरे पर डालती थीं, लेकिन दूसरी ओर तुर्कों में पर्दा नहीं थी। तुर्क वंशी तैमूर की पत्नियां दरबार में सामने बैठती थीं। इस तरह से पर्दा, बुरका ये सब बहुत पुराने समय से अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार होता रहा है। इतिहास में इसको लेकर दबाव नहीं दिखता है।