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ब्लैक फंगस से डरें नहीं... बस साफ सफाई रखें

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आशीष निगम
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इन दिनों पूरे प्रदेश में कोरोना की तीसरी लहर और ब्लैक फंगस के संक्रमण को रोकने के लिए हर तरह की तैयारी की जा रही है। मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधिकारी तक इसको रोकने में लग रहे हैं। ब्लैक फंगस या म्यूकॉरमायकोसिस बीमारी दशकों से हो रही है, ये कोई नई बीमारी नहीं है। आम दिनों में लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता सामान्य होती है। अधिसंख्य लोग मुंह, नाक और आंखों को लगातार साफ करते रहते हैं, इसलिए ये बीमारी नहीं होती है। परंतु कोरोना संक्रमित लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से इसका खतरा बढ़ गया है। गांधी आई हॉस्पिटल के सुपर स्पेशलिस्ट वाइट्रियो रेटिनल सर्जन डॉ. अमित गुप्ता कहते हैं कि उन्होंने आठ साल में तीन ऐसे मामले देखे थे, लेकिन कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर के बाद अभी तक तीन केस सामने आए हैं, जो उनके परामर्श के लिए बताए गए थे। सभी केस स्टेज फोर्थ के थे, इसलिए इनको चंडीगढ़ पीजीआई और एम्स दिल्ली रेफर किया गया।
डॉ. अमित बताते हैं कि कोविड काल में जो लोग कई कई दिनों तक बिस्तर पर रहते हैं। ठीक से आंख, मुंह और नाक साफ नहीं कर पाते हैं। लगातार एक ही मास्क से ऑक्सीजन लेते रहते हैं। तब ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ जाता है। इसके बढ़ने की रफ्तार इतनी तेज होती है कि आठ-नौ दिन में ये जानलेवा हो सकता है। इसकी चार स्टेज हैं। जिसमें अर्ली स्टेज थ्री तक इलाज लेना आसान है, इसके बाद भी उपचार होता है, लेकिन बचने की संभावना बहुत कम रह जाती है। अलग अलग स्टेज पर इसके उपचार में आई स्पेशलिस्ट, ईएनटी सर्जन, प्लास्टिक सर्जन और न्यूरो सर्जन डॉक्टर की आवश्यकता होती है।
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ऐसे लोग जल्द आते हैं इसकी जद में
ये बीमारी उन लोगों में अधिक होती है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। जो ठीक से शरीर की सफाई नहीं कर पा रहे हैं। जिनकी डायबिटीज नियंत्रित नहीं है। अंग प्रत्यारोपण हुआ है। शरीर के किसी अंग के इलाज में हाई इम्यूनोसप्रेशन की दवाएं दी गई हैं। जिन लोगों के ऑक्सीजन उपकरण ठीक से साफ नहीं किए जाते हैं। बिस्तर, कपड़े, तौलिया, रुमाल ठीक से साफ नहीं रखते हैं। कई बार लोग खुद ही बिना डॉक्टर की रायशुमारी के स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक का सेवन करते रहते हैं। ऐसे लोग इसके खतरे में आते हैं।
ऐसे बढ़ता है ब्लैक फंगस
ब्लैक फंगस वातावरण में मौजूद कई तरह के फंगस में से एक है। कोरोना मरीजों में जब फेफड़े संक्रमित हो जाते हैं तो शरीर में खून के थक्के बन कर टूटते हैं। जिससे शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है। इधर, स्टेरॉयड और हाई एंटीबायोटिक दवाओं से शरीर में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है। यही आयरन और ग्लूकोज ब्लैक फंगस के लिए खाना बन जाता है, जिसको खाकर ये फंगस कुछ घंटों में दोगुना हो जाता है। यानी सात से दस दिन में ये नाक से दिमाग तक संक्रमण फैला कर मरीज को संभलने का मौका नहीं देता है।
ऐसे पहचाने ब्लैक फंगस को
1- नाक में खुजली होना, काले काले कण निकलना, खून के कतरे आना।
2- नाक में खुशबू नहीं आना, नाक और मुंह से बदबू आना।
3- नाक की बदबू मरीज के साथ उसके साथ रहने वाले को भी आएगी।
4- आंख के पास सूजन आ जाए। दांत हिलने लगे। तालु पर जख्म हो जाए।
ब्लैक फंगस की चार स्टेज
ये संक्रमण नाक से शुरू होता है। नाक से शुरू होकर साइनस में फैलता है। इसी दौरान आंख की नसों में घुस जाता है। आंख, पलक और हड्डी को अपनी जद में ले लेता है। इसके बाद ये दिमाग की हड्डी को गला कर दिमाग को प्रभावित करता है। ये फंगस नाक में स्टेज वन, साइनस में स्टेज टू, आंख को स्टेज थ्री और दिमाग को स्टेज फोर्थ में प्रभावित करता हे। स्टेज थ्री के शुरुआती दौर तक आंख की रोशनी बचाई जा सकती है। इसके बाद इलाज बहुत जटिल होता है। जिसमें आंख और मरीज के बचने की उम्मीद कम हो जाती है।
1- स्टेज वन के लक्षण- नाक में खुजली, बदबू, काले कण निकलना, खून निकलना और खुजली होना।
2- स्टेज टू के लक्षण- मुंह में तीक्ष्ण बदबू, आंख के पास गाल पर सूजन। दांत हिलने लगे या तालु पर जख्म हो जाए।
3- स्टेज थ्री के लक्षण- आंख के चारों ओर की हड्डी तोड़ कर उसके पीछे आ जाता है। आंखें स्थिर होने लगती है और रोशनी कम हो सकती, पलक गिरने लगती है। आंख अपने स्थान से बाहर आने लगती है।
4- स्टेज फोर्थ के लक्षण- आंख से दिमाग की ओर पहुंच कर दिमाग की हड्डी को गला देता है। जिससे दिमाग से जुड़ी क्रियाएं प्रभावित होती हैं। इससे दिव्यांगता, अपगंता, अंधता या मृत्यु तक हो सकती है।
ये है बचाव का तरीका
1- ऑक्सीजन को ह्यूमिटीफाइड करने में हमेशा साफ डिस्टल या आरओ के स्वच्छ पानी का इस्तेमाल करें।
2- ऑक्सीजन का मास्क और उपकरण रोजाना हायजीन किए जाएं। बिस्तर, तकिया और चादर साफ रखें।
3- मरीज की आंख, नाक, मुंह की सफाई अच्छे से कराएं। रोजाना कपड़े बदले, तौलिया, रुमाल साफ रखें।
4- अगर नेबुलाइजर का प्रयोग कर रहे हैं तो प्रत्येक चक्र के बाद बिटाडीन से कुल्ला जरूर कर लें।
5- अगर स्टेरॉयड इनहेल करते हैं तो भी मुंह को बिटाडीन से कुल्ला करें और साफ कर लें।
6- मरीज का खाना पीना साफ सुथरा हो। खाने के बर्तन और गिलास भी साफ करने के बाद प्रयोग करें।
स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक दवाएं
केवल डाक्टर की सलाह पर लें
हर व्यक्ति की आंख, मुंह और नाक में सिमबायोटिक (लाभदायक) बैक्टीरिया रहते हैं, ये बैक्टीरिया ही इन फंगस को मार देते हैं। लेकिन जब एंटीबायोटिक और स्टेरॉयड दवा का सेवन कराया जाता है तो हानिकारक बैक्टीरिया के साथ ये लाभदायक बैक्टीरिया भी मर जाते हैं, जिससे फंगस का खतरा बढ़ता है। इसलिए डॉक्टर की राय से बेहतर से बेहतर एंटीबायोटिक और स्टेरॉयड ही प्रयोग करें। डॉक्टर की राय के बिना स्टेरायड और एंटीबायोटिक बिल्कुल न खाएं।
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आंखों की किसी भी बीमारी के लिए गांधी आई हॉस्पिटल उत्तर भारत का जाना माना अस्पताल है। इसलिए अगर किसी मरीज को ब्लैक फंगस की शिकायत या लक्षण हो तो वह अस्पताल में अपनी जांच करा कर उचित इलाज करा सकता है। बीते कुछ दिनों से इस बीमारी के नाम पर मरीजों को डराने की शिकायतें सुनने में आई। मरीज घबराए नहीं। सही जगह पहुंच कर जांच कराएं।
मधुप लहरी, प्रशासनिक अधिकारी गांधी आई हॉस्पिटल।
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