वर्ष 2017 की जिस मोदी लहर में भाजपा के विधायक 50-50 हजार से अधिक वोटों से जीतकर यूपी विधानसभा में पहुंचे थे, उस लहर में अलीगढ़ शहर सीट पर भाजपा मात्र 15 हजार वोटों से जीती थी। मतलब कांटे के मुकाबले में जीत का स्वाद चखा था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सियासी समर में इस सीट पर न कोई मुद्दा असरकारी होता है और न लहर अपना प्रभाव छोड़ पाती है। बस ध्रुवीकरण इस सीट का सियासी सफर तय करता है। हां, जीत में सबसे अहम किरदार होता है मतदान का प्रतिशत। हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के सहारे कभी भाजपा तो कभी विपक्ष के पाले में यह सीट रहती है। सीट पर काबिज सत्ताधारी दल को यहां विरोध, चेहरों से नाराजगी और भितरघात से जरूर जूझना पड़ रहा है। इसका लाभ लेने की कोशिश विपक्ष कर रहा है। अब इसमें कौन कितना सफल होगा? ये परिणाम तय करेगा। फिलहाल, मुकाबला बेहद कांटे का बना हुआ है। एक तरफ सत्ताधारी भाजपा को सपा टक्कर दे रही है तो कांग्रेस व बसपा खेमा सेंधमारी के सहारे सपा की राह का रोड़ा बनता नजर आ रहा है।
ये है सियासी दलों की अपनी रणनीति
शहर सीट पर मौजूदा विधायक संजीव राजा की पत्नी मुक्ता राजा को टिकट देकर बस चेहरा बदला गया है। बल्कि नाम पुराना ही माना जा रहा है। सपा ने पुराने चेहरे के रूप में जफर आलम को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने युवा तुर्क एएमयू छात्रसंघ के अध्यक्ष सलमान इम्तियाज पर दांव खेला है तो बसपा ने मुस्लिमों के वर्ग विशेष में पकड़ रखने वाली रजिया खान को उतारा है। इस बार आम आदमी पार्टी ने मोनिका थापर को भी चुनावी मैदान में उतारा है। केके नवमान के बाद यह दूसरा मौका है, जब भाजपा इस सीट पर लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए है। मगर, उसकी राह में रोड़े कम नहीं हैं। पहली वजह टिकट न मिलने से अन्य दावेदारों की नाराजगी और वैश्य धड़ों के भितरघात से निपटना बड़ी चुनौती है। दूसरा सत्तापक्ष के खिलाफ लहर और तीसरा कोली समाज की नाराजगी। हालांकि, इस सबसे निपटने के लिए खुद प्रत्याशी पति, पार्टी-संगठन के पदाधिकारी पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। मगर सपा खेमा लगातार चोट पहुंचा रहा है। मुस्लिम ध्रुवीकरण के साथ-साथ वह भाजपा के बिखरे वोटों पर अपनी पकड़ के लिए जोर लगा रहा है। कांग्रेस व बसपा अपने परंपरागत वोटों के साथ-साथ नए वोटों में सेंधमारी का प्रयास कर रही है। सपा व भाजपा खेमे का सबसे ज्यादा प्रयास मत प्रतिशत बढ़ाने पर है, क्योंकि इसी से जीत-हार तय होगी। पिछले परिणाम के अनुसार मुस्लिम वर्ग का मतदान प्रतिशत कम और हिंदू वर्ग का मतदान प्रतिशत अधिक होना भी भाजपा की जीत का कारण बना था।
यहां तो खुल्लम-खुल्ला है आमने-सामने का हल्ला
शहर सीट पर मतदाता खुलकर बात कर रहा है। पला में रहने वाले अनुसूचित जाति के प्रमोद कुमार कहते हैं कि प्रत्याशी कोई मायने नहीं रखता। भाजपा की नीतियों के सहारे हम वोट की बात कह रहे हैं। सरकार की राशन वितरण योजना से लेकर आवास आदि की योजनाएं बेहद प्रभावित कर रही हैं। दूसरा हम वोट कहीं दें, लोग यही मानते हैं कि भाजपा को दिया होगा। सराय रहमान में रहने वाले चाय विक्रेता फईम कहते हैं कि शहर में बस वोट दो तरफ ही पड़ता रहा है और उसी तरह पड़ेगा। एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ भाजपा के सामने वाला सबसे मजबूत दावेदार। इलाके में सपा मजबूती से भाजपा के सामने खड़ी है।
- 2022 के रण में ये प्रत्याशी--
- मुक्ता राजा - भाजपा, मो. सलमान इम्तियाज - कांग्रेस, जफर आलम - सपा, रजिया खान - बसपा, मोनिका थापर - आप।
-2022 के चुनाव में मतदाता
- कुल मतदाता - 395519
- पुरुष मतदाता - 201319
- महिला मतदाता -183167
- 2017 के चुनाव के नतीजे--
- संजीव राजा (भाजपा) को मिले मत - 113752
- जफर आलम (सपा) को मिले मत - 98312
- मो. आरिफ (बसपा) को मिले मत -25704
- अनुमानित जातीय मतदाता -
- 1.45 लाख मुस्लिम, 1.20 लाख वैश्य, 40 हजार कोली, 20 हजार ब्राह्मण, 15 हजार धोबी, 10 हजार जाटव, 10 हजार वाल्मीकि, बाकी अन्य मतदाता।
रजिया खान। शहर प्रत्याशी बसपा- फोटो : CITY OFFICE
सलमान इम्तियाज । शहर प्रत्याशी कांग्रेस- फोटो : CITY OFFICE
जफर आलम। शहर प्रत्याशी सपा- फोटो : CITY OFFICE