यह पहला मौका नहीं, इससे पहले भी अलीगढ़ जिले की अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाई जा चुकी है। 14 साल पहले देहली गेट थाना क्षेत्र के ही तिहरे हत्याकांड में तीन आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। अब 14 साल बाद भी इसी थाना क्षेत्र से जुड़ी घटना में पांच हत्यारों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है।
आजादी से पहले की हेरीटेज बिल्डिंग में संचालित जनपद न्यायालय का इतिहास काफी पुराना है। हालांकि, यहां हुए पुराने घटनाक्रमों का कोई दस्तावेजी रिकार्ड नहीं है, मगर पुराने जानकारों की मानें तो अलीगढ़ न्यायालय से कई मर्तबा फांसी की सजा सुनाई गई है। उस समय एडीजे न्यायालय में बतौर एडीजीसी एडीजे प्रथम के एडीजीसी अमर सिंह तोमर के अनुसार, मुजफ्फरनगर के टैंकर चालक-क्लीनर व एक अज्ञात यात्री की टैंकर लूट के बाद हत्या की गई, जिनके शव गभाना क्षेत्र में बरामद हुए थे, जिसका मुकदमा देहली गेट थाने में दर्ज हुआ। इस मुकदमे का फैसला 2008 में हुआ और तीनों आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।
एडीजीसी जितेंद्र सिंह तोमर के अनुसार, मुरसान के एक हत्याकांड में अदालत से 2000 के दशक में आरोपियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। इससे पहले 1994 में हाथरस के कमराबाग हत्या में उस समय पांच हत्याएं हुई थीं, उसमें दो दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। इसी तरह जिले के लोधा के गांव ल्हौसरा की रंजिश में 1984 में हुए हत्याकांड के एक दोषी को 1991 में स्थानीय अदालत से मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। 2008 के बाद अब यह पांच लोगों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है। हालांकि बाद में ये सभी सजाएं हाईकोर्ट से बदल दी गईं।
अलीगढ़ के किसी दोषी को नहीं लगी फांसी
यह कानून का अलग पहलू है। जिले से कई मर्तबा मृत्युदंड की सजा सुनाई गई हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर दीक्षित बताते हैं कि आज तक जिले के किसी दोषी को फांसी नहीं लगी है। ज्यादातर मामलों में हाईकोर्ट में आरोपी पक्ष के अधिवक्ताओं की अपील व दलील के बाद सजाएं बदली गईं हैं।
पश्चिमी यूपी में सिर्फ मेरठ जेल में है फांसी दिए जाने की सुविधा, अभी यहीं रहेंगे पांचों
नी में रखा जाएगा। इनकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाएगी। इनके खाने पीने तक का ध्यान रखा जाएगा।
जेलर पीके सिंह ने बताया कि अलीगढ़ जेल में फांसी की कोई व्यवस्था नहीं है। पश्चिमी यूपी में सिर्फ मेरठ जेल में फांसी की व्यवस्था है। जब तक इन के अन्य अपराधों का ट्रायल पूरा नहीं हो जाएगा, तब तक यहां से किसी दूसरी सेंट्रल जेल नहीं भेजा जाएगा। हालांकि, नियम यह है कि कैदी को सजा मिलने के बाद सेंट्रल जेल शिफ्ट किया जाता है। चूंकि, इनमें से पांच पर तीन-तीन व एक पर दो अपराध अभी न्यायालय में लंबित हैं। इसलिए इन्हें यहां से शिफ्ट नहीं किया जा सकता।