बैंकिंग कारोबार से जुड़ी कुछ बड़ी फर्में भी थीं। इनमें जहूर अली और अब्दुल गफ्फार खान ने अलीगढ़ के मियां गंज में अपना प्रतिष्ठान खोला था। दोनों की बुलंदशहर जिले में काफी बड़ी संपत्तियां थीं। राम जी-लक्ष्मण दास फर्म के स्वामी खुर्जा के बाशिंदे थे। इनकी खुर्जा में सूती कपड़ों की एक मिल थी। इनके कारोबारी भागीदार एक गुजराती गोपालदास थे। इन्हीं की तरह लल्ला मल-हरदेव दास फर्म भी थी। इसके स्वामी हाथरस और अलीगढ़ में सूती वस्त्र के कारोबार से जुड़े थे। आगरा के कारोबारियों की फर्म हीरा लाल-चुन्नी लाल ने दो साल के लिए अलीगढ़ में भी अपनी एजेंसी खोली थी।
उस दौर में अलीगढ़ के बैंकर बुधसेन नैनसुख का नाम भी उल्लेखनीय है। डिबाई के हरदेव दास-लाल चंद भी बैंकिंग व्यवसाय से जुड़े थे, हालांकि उनका भी कपड़ों का कारोबार था। जिले की अन्य फर्मों में हरनंद राय- फूलचंद, नंदराम-बेनी राम, हरमुख राय-दुली चंद उल्लेखनीय थे। हाथरस में बैंकिंग कारोबार मुख्यतः मारवाड़ियों के हाथ में था। ये लोग लगभग एक शताब्दी पहले मारवाड़ से आकर यहां बसे थे। निजी बैंकरों के कारोबार में धीरे-धीरे गिरावट आने लगी। क्योंकि सार्वजनिक बैंकों ने ब्याज की दर काफी घटा दी थी।
38 फीसदी तक ब्याज लेते थे साहूकार
शुरुआती दौर में साहूकारी का काम वैश्य और ब्राह्मणों द्वारा किया जाता था। इनकी ब्याज दर में कोई समानता नहीं थी। यह 12 फीसदी से लेकर 37.5 फीसदी तक हो सकता था। अगर कर्ज किसी वस्तु या संपत्ति को गिरवी रखकर लिया जाता था तो ब्याज दर में कमी भी कर दी जाती थी। बहुधा किसान फसलों के लिए गांवों के साहूकारों से कर्ज लेते थे, जो फसल होने पर चुकाया जाता था। कई बार सूखे-अकाल की स्थिति में किसान इसे नहीं चुका पाते तो उनसे बहुत ज्यादा ब्याज लिया जाता अथवा गिरवी रखा सामान रख लिया जाता था। सार्वजनिक बैंकों के आगमन से ब्याज दर में गिरावट के अलावा एकरूपता भी आ गई थी। इनका ब्याज दर छह फीसदी रहता था।
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स्रोतः अलीगढ़ का गजेटियर 1878-1909