दीनियात विभाग के ही सैयद मोहम्मद अहमद काजमी कहते हैं कि दो तरह से किसी भी जानवर को मारा जाता है। एक झटका और दूसरा हलाल।इसका मकसद है कि जानवर को मारा जाए लेकिन कम तकलीफ देकर, इसमें एक खास रग को काटा जाता है जिससे तकलीफ कम हो। यह प्रकृति एक व्यवस्था के तहत चल रही है।
उन्होंने बताया कि कई जगह पर जला कर या कुल्हाड़ी से मारा जाता है लेकिन हलाल की जो प्रक्रिया है वह मजहब के तहत है। यह इंसानियत के लिए बेहतर है। एक दूसरे पर निर्भर हैं। इंसान जानवर खाता है, जानवर दूसरे जानवर खाता है। दूसरा जानवर घास खाता है। अब यह साबित हो गया है कि जान सब में होती है। इसके अलावा सिर्फ मुस्लिम ही जानवर नहीं काटते। अन्य मजहब में भी बलि दी जाती है और जानवर काटे जाते हैं। बस इस्लाम में हमें एक तरीका बताया है कि जानवर को कम नुकसान और तड़पाकर काटा जाए। उसके अवशेष को सही तरीके से निष्पादित किया जाए।