एम्स में ही विवेचक ने छात्रा के बयान लिए थे, जिसमें उसने विद्यालय के उप प्रधानाचार्य व प्रबंधक आदि पर भी आरोप लगाए थे। प्रबंधक पर यौन उत्पीड़न करने व शिक्षकों पर इसके लिए दबाव बनाने के आरोप शामिल थे। करीब दस दिन उपचार चलने के बाद छात्रा जब घर वापस आई तो उसके न्यायालय में भी बयान कराए गए। कुछ अन्य छात्राओं ने भी कोतवाली पहुंचकर विद्यालय की शिक्षिका, प्रबंधक आदि पर यौन उत्पीड़न जैसे संगीन आरोप लगाए थे। इस आधार पर पुलिस ने मामले में मुकदमे में यौन उत्पीड़न व पॉक्सो की धाराओं की बढ़ोतरी तो की, लेकिन बिना किसी को गिरफ्तार किए 15 सितंबर को चार्जशीट दायर कर दी। परिवार का आरोप है कि एसपी क्राइम ने भी इस मामले की जांच की थी और कहा था कि बेशक आरोप छेड़खानी का है, लेकिन आरोपियों को पॉक्सो एक्ट में जेल भेज सकते हैं।
परिवार की शिकायत पर हुआ अब ये आदेश
पुलिस की इसी कार्रवाई से नाराज परिवार लगातार विवेचना बदलने की मांग करता रहा है। परिवार की दलील थी कि किसी दबाव में पुलिस ने आरोपियों को बिना जेल भेजे चार्जशीट दायर कर दी है। जिला स्तर पर सुनवाई नहीं होने पर परिवार ने गृह मंत्रालय में शिकायत की व पॉक्सो के मामले में बिना किसी को जेल भेजे चार्जशीट लगाने पर ऐतराज जताया, साथ ही उच्च स्तरीय एजेंसी या सीबीआई से जांच कराने की मांग की। इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए गृह मंत्रालय के अवर सचिव की ओर से 30 सितंबर को कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग भारत सरकार के सचिव को प्रकरण संदर्भित करते हुए अग्रिम जांच व कार्रवाई की सिफारिश की है। इसमें कहा है कि पीडित पक्ष ने सीबीआई जांच की मांग की है। चूंकि सीबीआई आपके अधीन है। इसलिए अग्रिम कार्रवाई से पीड़ित पक्ष को भी अवगत कराने को कहा गया है।