फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मूर्ति कारोबार: अलीगढ़ के लड्डू-गोपाल की विदेशों तक मांग, देश के साथ-साथ दूसरे मुल्कों में भी जाते हैं

Fri, 21 Jul 2023 04:28 AM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

ब्रास (कापर, पीतल व जस्ता मिक्स) निर्मित यह मूर्ति अलीगढ़ की पहचान है। ताला कारोबार के साथ ही आजादी के पहले से यहां ढलाई के जरिये पीतल की मूर्ति बनाने का काम चल रहा है। पहले मूर्तियां बनाकर छोटे-छोटे व्यापारी दिल्ली के बाजार में खुद ही बेचने जाया करते थे। मगर पिछले पांच दशक से यह कारोबार तेजी से बढ़ा है।
विज्ञापन
अलीगढ़ के लड्डू गोपाल - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अलीगढ़ में श्रावण मास के साथ बाजार में त्योहारी तैयारी शुरू हो गई है। मूर्ति कारोबारियों ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि अधिकमास के चलते अभी आर्डर कम हैं। विदेशी मांग को ध्यान में रखते हुए कारोबारी लड्डू-गोपाल बनाने भेजने की तैयारी में लग गए हैं। शहर में बने लड्डू गोपाल देश के साथ-साथ दूसरे मुल्कों में भी जाते हैं। दस करोड़ से अधिक के विदेशी ऑर्डर का अनुमान लगाया जा रहा है।

विज्ञापन


ब्रास (कापर, पीतल व जस्ता मिक्स) निर्मित यह मूर्ति अलीगढ़ की पहचान है। ताला कारोबार के साथ ही आजादी के पहले से यहां ढलाई के जरिये पीतल की मूर्ति बनाने का काम चल रहा है। पहले मूर्तियां बनाकर छोटे-छोटे व्यापारी दिल्ली के बाजार में खुद ही बेचने जाया करते थे। मगर पिछले पांच दशक से यह कारोबार तेजी से बढ़ा है। यहां की मूर्ति की खास पहचान है, जो अंदर से खोखली होती है। इसको वेल्डिंग के साथ बनाया जाता है। इससे उल्ट दक्षिण भारत में ठोस मूर्ति बनाई जाती हैं, जो वजनी और कीमती भी होती है। पीतल नगरी मुरादाबाद के कारोबारी भी यहां से मूर्ति बनवाकर मंगाते हैं। शहर के सासनी गेट, जयगंज, सराय भूखी, भुजपुरा, पला रोड, बिहारी नगर व उनसे सटे आसपास के इलाकों में यह कुटीर उद्योग है। किसी घर में ढलाई, किसी में पॉलिश, किसी में चिताई, किसी में वेल्डिंग का काम मजदूरी पर होता है। शहर के सासनी गेट इलाके में कई मुस्लिम परिवारों में भी ये मूर्तियां बनाई जाती हैं।

ऐसे बनती है मूर्ति
यहां पीतल की चादर या सिल्ली की दो तरह से मूर्ति बनती हैं। जिसकी पहले मिट्टी के सांचे में ढलाई होती है। फिर उसके टुकड़ों को वेल्डिंग के जरिये जोड़ा जाता है। इसके बाद सबसे महीन काम चिताई के जरिये स्वरूप गढ़ा जाता है। इसके बाद पॉलिश से इसको चमकाया जाता है।
विज्ञापन


यहां तक सप्लाई
दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट, कर्नाटक के अलावा मुरादाबाद, मथुरा, वृंदावन में सर्वाधिक आपूर्ति होती है। ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी मूर्तियां बिक रही हैं। कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस में रहने वाले भारतीयों के बीच इनकी मांग है। देश विदेश में इस्कान मंदिरों के स्टालों पर भी इनकी आपूर्ति है।

विज्ञापन

ये उत्पाद भी होते तैयार

कोलकाता एवं सूरत की फैंसी पोशाक, जड़ी वाली पोशाक, लड्डू गोपाल का ट्रेवलिंग बैग, स्कूल बैग, मच्छरदानी, कूलर, पंखे, एसी, राखी, इत्र, स्प्रे, मंदिर के पर्दे, आसन, इंडोर गेम, खिलौने, गुजराती मीने के फैंसी झूले, कोलकाता के मोती के झूले, फैंसी फूल बंगले, गाय-बछड़े के सेट, भोग की थाली, माखन-मटकी, बच्चों की पोशाकें।



कारोबार एक नजर में
  • 500 करोड़ रुपये सालाना है पीतल मूर्ति का कारोबार
  • 150 करोड़ रुपये सालाना का है निर्यात
  • 35 निर्यातक विदेशी बाजार में बेचते हैं पीतल मूर्ति
  • 50 बड़े पीतल मूर्ति के हैं निर्माता
  • 50 हजार लोगों की जुड़ी है रोजी रोटी
  • 500 ढलाई भट्टी व मेन्युफैक्चरिंग यूनिट

मूर्तियों की कीमत
  • सामान्य 700 रुपये किलो से शुरू
  • सुपरफाइन 800 रुपये किलो तक
  • अष्टधातु 1250 रुपये किलो तक


जन्माष्टमी के समय लड्डू गोपाल की मांग बढ़ती है। अभी से तैयारियां शुरू हो रही हैं। अभी घरेलू बाजार में मांग कम है मगर, विदेशी वायर जानकारी जुटाने और ऑर्डर देने के लिए संपर्क करने लगे हैं। सुपरफाइन मूर्ति की अधिक मांग होती है। -अशोक यादव, निर्माता/निर्यातक 
भारतीय बाजार में मांग कम है। लड्डू गोपाल की मांग आने लगी है। विदेशी ऑर्डर भी आ रहे हैं। पिछले वर्ष की अपेक्षा मांग कम है। आने वाले दिनों में अच्छे ऑर्डर की उम्मीद है।-कोमल कटारा, निर्माता/निर्यातक 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें