फैजान अंसारी विदेश स्थित आईएसआईएस संचालकों के संपर्क में था, जो उसे प्रतिबंधित संगठन में भर्ती के लिए मार्गदर्शन कर रहे थे। आईएसआईएस के अन्य सदस्यों के साथ, वह हिंसक कार्रवाइयों की योजना बना रहा था और विदेश में आईएसआईएस संघर्ष थिएटर में ‘हिजरात’ करने पर विचार कर रहा था।
डार्क नेट के माध्यम से जुड़ा था फैजान
एनआईए सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार फैजान अंसारी डार्कवेब नेट के माध्यम से आईएसआईएस आतंकियों के संपर्क में था। वह पिछले दो माह से अपने घर पर रह रहा था। वहीं से जेहाद को लेकर सक्रिय था। एनआईए की टीम उस पर पिछले एक सप्ताह से नजर रखे हुए थी। जब उसके आईएसआईएस के स्लीपर सेल होने की पुख्ता जानकारी हासिल मिली तो उसे गिरफ्तार किया। उसके लैपटॉप को खंगाला गया तो कई आपत्तिजनक डाक्यूमेंट्स बरामद किए गए। जानकारी मिली कि वह डार्कवेब नेट के माध्यम से लगातार देश और विदेश के आईएसआईएस एजेंट से संपर्क साधे हुए था। अभी उससे पूछताछ में उसके द्वारा अन्य लोगों को शामिल करने की जानकारी जुटाई जाएगी।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान आया संपर्क में
एनआईए से मिली जानकारी के अनुसार फैजान दो साल पहले लोहरदगा से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढऩे आया था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान ही वह आईएसआईएस के संपर्क में आया था। यह बात उसने खुद स्वीकारी है। इधर, उसके पिता फिरोज अंसारी बीएसएनएल में संविदा कर्मी हैं।
जिला पुलिस एएमयू से मांग रही ब्योरा
एसपी सिटी कुलदीप सिंह गुणावत ने बताया कि एनआईए ने हमसे जो मदद मांगी थी दी है। मगर एनआईए ने हमसे कोई तथ्य साझा नहीं किया है। फिर भी जो जानकारियां मिली हैं, उसके आधार पर एएमयू से उसके विषय में जानकारी मांगी जा रही है। ताकि उसके क्रियाकलापों, उसके दोस्तों, साथियों व अन्य गतिविधियों का ब्योरा संकलित किया जा सके।
एएमयू ने कहा यह
देर शाम इस विषय में हमें जानकारी मिली है। मगर सीधे तौर पर एनआईए ने हमसे कोई बात साझा नहीं की है। फिर भी देर रात तक इस नाम के युवक के विषय में ब्योरा खंगाला जा रहा था। मगर एएमयू में छात्र होने का कोई रिकार्ड नहीं मिल रहा। चूंकि एएमयू में बहुत से स्कूल भी हैं और उसकी उम्र 19 वर्ष बताई गई है। इसलिए स्कूलों का रिकार्ड भी दिखवाया जाएगा। उसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।-प्रो.वसीम अली, एएमयू प्रॉक्टर
बेशक बृहस्पतिवार देर रात तक एएमयू इंतजामिया ने फैजान अंसारी के एएमयू छात्र होने की पुष्टि नहीं की। मगर आतंकी और देशविरोधी गतिविधियों को लेकर अक्सर अलीगढ़ और एएमयू का नाम जुड़ता रहा है। पांच वर्ष में यह दूसरा मामला है, जब किसी छात्र के आतंकी संगठन से जुडऩे पर एएमयू का नाम उछला है। पांच वर्ष पहले एएमयू के ही कश्मीरी शोध छात्र मन्नान वानी ने हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद उसका स्थान लिया था। हालांकि दस माह बाद ही वह कश्मीर में मुठभेड़ में मारा गया। मगर अब एएमयू से दूसरा नाम फैजान का आया है। जिसे लेकर तरह-तरह की चर्चाओं ने जन्म ले लिया है। तमाम एजेंसियों के निशाने पर एक बार फिर एएमयू आ गया है। अब फैजान के ठिकानों, करीबियों, गतिविधियों आदि पर एजेंसियों ने काम शुरू कर दिया है।
कुपवाड़ा जिले के गांव टकीपोरा लोलब का शोध छात्र मन्नान बशीर वानी जनवरी 2018 में अचानक एएमयू से गायब हो गया था। उसके आतंकी संगठन में शामिल होने की चर्चाओं से संबंधित खबर सबसे पहले अमर उजाला में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद से पूरे देश में खलबली मच गई थी। तत्कालीन एसएसपी राजेश कुमार पांडेय ने एएमयू के हबीब हॉल में छापा मारकर मन्नान वानी का कमरा सील कर दिया था। पूरे देश की सुरक्षा एजेंसियां चौकन्ना हो गयी थीं। बाद में खबर आयी कि वह आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया है। उससे संबंधित तस्वीरें सोशल मीडिया में आयी थीं।
एएमयू प्रशासन द्वारा मन्नान वानी को निष्कासित कर दिया गया था। मन्नान बशीर वानी ने वर्ष 2013 में एमएससी में एएमयू के भूगर्भ विज्ञान विभाग में दाखिला लिया था। यहीं से 2014-15 में एमफिल की। उसके बाद विभाग के प्रो. सैयद अली अहमद के निर्देशन में शोध कर रहा था। एमफिल एवं एमएससी के दौरान वह हबीब हॉल के कमरा नंबर क्रमश: 72 व 41 में रहा। नवंबर 2016 में पीएचडी में दाखिला लिया। उस समय वह हबीब हॉल के कमरा नंबर 237 में रहता था। यहां से भागने के बाद अक्तूबर २०१८ में उसके हिजबुल मुजाहिदीन कमांडर के रूप में मुठभेड़ में मारे जाने की पुष्टि सेना ने की थी। यह भी उजागर हुआ था कि उसने बुरहान वानी का स्थान लिया था और एएमयू में रहकर वह लगातार संगठन के संपर्क में रहा।
उसने कश्मीर में मारे गए आतंकी बुरहान वानी के समर्थन में कैंपस में पोस्टर बांटे थे। तब, पुलिस व इंतजामिया ने सामान्य बात मानकर नजरअंदाज कर लिया था। चूंकि वह मेधावी छात्र था और भोपाल में हुई एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में शोधपत्र के लिए सम्मानित भी किया गया था। इसके पहले 2017 के छात्रसंघ चुनाव में भी वह सक्रिय रहा। उसके मारे जाने के बाद एएमयू में कश्मीरी छात्रों ने जनाजे की नमाज पढऩे की कोशिश हुई और उसके समर्थन में नारेबाजी की, जिस पर मुकदमा दर्ज हुआ था।
कहीं किसी स्कूल का छात्र तो नहीं
फैजान के विषय में उसकी उम्र को देखते हुए एक बात सामने आ रही है कि वह कहीं एएमयू के किसी स्कूल का छात्र तो नहीं। क्योंकि स्कूल के छात्र ही ज्यादातर कैंपस के बाहर किराये पर रहते हैं। क्योंकि स्कूल के छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधा बहुत कम है। इस वजह से अब स्कूलों का रिकार्ड खंगलवाया जा रहा है।
सिमी से पीएफआई तक का अलीगढ़ से जुड़ाव
स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) की स्थापना जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई के रूप में अप्रैल 1977 में अलीगढ़ में एएमयू छात्रों के द्वारा हुई। उस समय शमशाद मार्केट पर कार्यालय बनाकर प्रो. मो. अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने इसे खड़ा किया। इसे एसआईओ (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन) का दूसरा रूप बताया गया। जैसे-जैसे देश में सांप्रदायिक घटनाओं और देश विरोधी गतिविधियों में 1984 के बाद सिमी कार्यकर्ताओं के नाम सामने आने लगे तो 2001 में प्रतिबंध के बाद से वहां ताला लग गया। हालांकि 2008 में अल्प समय के लिए प्रतिबंध हटा, लेकिन वह फिर बरकरार हो गया। इसके आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही को प्रतिबंध के बाद जेल गए और रिहा होने के बाद वह आजमगढ़ में अपना क्लीनिक चलाने लगे।
शमशाद मार्केट मुख्यालय पर आज भी ताला लगा है और खुफिया निगरानी रहती है। खास बात यह है कि जो उस समय के सक्रिय सदस्यों की सूची खुफिया तंत्र के पास थी, उनमें ज्यादातर या तो बुजुर्ग हो गए हैं, या फिर उनकी सक्रियता खत्म हो गई। कुछ इसके कटरपंथी ग्रुप इंडियन मुजाहिदीन व अब आकर पीएफआई से जुडक़र काम करने लगे थे। पिछले दिनों आजमगढ़ के रहने वाले एक पीएफआई सदस्य को अलीगढ़ से ही जेल भेजा गया। वह धौर्रा में किराये पर रह रहा था। सीएए-एनआरसी उपद्रव में भी यहां पीएफआई की भूमिका सामने आई थी।
2008 में अहमदाबाद बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के सरायमीर बीनापारा का आईएम का खास सदस्य अबु बशर अलीगढ़ पहुंचा था। एक रात यहां रुकने के बाद यहां से चला गया। बाद में इस कांड के मुख्य साजिशकर्ता सफदर नागौरी के अलीगढ़ कनेक्शनों का भी इनपुट मिला। इन्हीं इनपुट पर काम करते हुए 5 दिसंबर 2020 को दिल्ली स्पेशल सेल ने सिविल लाइंस इलाके से एक बुजुर्ग व्यक्ति अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया था। इसकी पहचान 19 साल से फरार सिमी के सक्रिय सदस्य के रूप में हुई। बतौर उर्दू व फारसी अनुवादक के रूप में पहचान रखने वाले अब्दुल्ला ने वर्ष 1985 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अरबी में एमए किया था। उसे सिमी की मैगजीन के हिंदी वर्जन का संपादक बनाया गया। बाद में वह दिल्ली जामिया नगर में जाकर बस गया। दिल्ली से फरार होने के बाद वह अलीगढ़ आ गया। उसकी गिरफ्तारी के समय वह दोदपुर में परिवार के साथ किराये पर रहता था। उजागर हुआ था कि ब्लास्ट के बाद अबु बशर जब अलीगढ़ आया तो अब्दुल्ला के घर में रुका था। चूंकि सक्रियता कम थी, इसलिए खोजने में देरी हुई।
इन वजहों से अलीगढ़ रहा रडार पर
- सिमी की स्थापना के साथ-साथ यहां उसका मुख्यालय होना।
- कश्मीर से आने वाले कपड़ों में 1992 में एके-47 छिपाकर लाना।
- एके-47 मिलने के बाद 35 वर्ष से फरार आतंकी का आज तक सुराग नहीं।
- नागौरी द्वारा अलीगढ़ की मदद से ब्लास्ट प्लान करने के साक्ष्य मिलना।
- अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद आतंकी का अलीगढ़ रुककर जाना।
- कानपुर धमाकों के बाद एनकाउंटर में मारे व पकड़े आतंकी अलीगढ़ में रुके थे।
- होशंगाबाद में गिरफ्तार आतंकी द्वारा खुद को अलीगढ़ कोचिंग स्वीकारी।
- कश्मीर के छात्र मन्नान वानी द्वारा एएमयू में ही रहकर पढ़ाई करना।
- मन्नान वानी के भागने के बाद पकड़े शुभान ने अलीगढ़ रुकना स्वीकारा।
- फिर एकाएक आतंकी संगठन में शामिल होना, एन्काउंटर में मारा जाना।
- दोदपुर के फ्लैट से 21वर्ष बाद सिमी का एक सर्वेसर्वा पकड़ा जाना।