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उम्मीदों की मशाल : संजय दादा आएंगे, हम सबकी भूख मिटाएंगे

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बेटी अदिति व मान्या के साथजरूरतमंदों को भोजन बांटते संजय शर्मा। - फोटो : CITY OFFICE
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जेएन मेडिकल कॉलेज के आसपास मलिन बस्ती के लोगों और उनके बच्चों की जुबां पर हमेशा संजय दादा का नाम रहता है। कोरोना काल व लॉकडाउन के वक्त जब सारी गतिविधियां बंद हो गई थीं तो यहां रहने वाले लोगों के सामने खाना-पानी का संकट खड़ा हो गया था। ऐसे में गरीबों की भूख मिटाने का बीड़ा जेएन मेडिकल कॉलेज में तैनात वरिष्ठ तकनीकी सहायक संजय शर्मा ने उठाया। उन्होंने इन लोगों के लिए भोजन, पानी का इंतजाम किया। हालात सामान्य होेने के बावजूद वह हर बृहस्पतिवार को इस इलाके के रिक्शा चालकों व गरीबों को भोजन उपलब्ध कराते हैं।
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स्वर्ण जयंती नगर निवासी संजय शर्मा (49) ने 1995 में लैब असिस्टेंट के रूप में जेएन मेडिकल कॉलेज में नौकरी शुरू की। वर्तमान में वह वरिष्ठ तकनीकी सहायक हैं। कोरोना संक्रमण फैलने व लॉकडाउन लगने के बाद सारी गतिविधियां थम गई थीं, लोग घरों में कैद थे। कोरोना काल में ड्यूटी पर जाते समय उनको रास्ते में भूखे-प्यासे रिक्शा चालक, गरीब और बच्चे दिखते थे। गरीबों के दर्द को उन्होंने महसूस किया और इन लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का संकल्प लिया। इसके बाद घर में हलवाई बुलवाकर प्रतिदिन 200 लोगों के लिए भोजन के पैकेट तैयार करवाए और खुद अकेले बांटने निकल पड़ते थे। भूखे-प्यासे बच्चों को बड़े-बुजुर्ग सांत्वना देते थे कि संजय दादा आएंगे, हम सब की भूख मिटाएंगे।
उन्होंने यह काम ड्यूटी के साथ-साथ लगातार दो साल तक किया। हालात सामान्य हुए, मगर उनकी दिनचर्या नहीं बदली। अब संजय शर्मा हर बृहस्पतिवार को भूखे लोगों व रिक्शा चालकों को भोजन के पैकेट बांटते हैं। संजय शर्मा की सेवाभाव से प्रभावित लैब असिस्टेंट महफूज अली खान भी उनके साथ जुड़ गए। दोपहर एक से दो बजे का लंच होता है। इसी दरम्यान दोनों लोग भोजन के पैकेट बांटते हैं।
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हलवाई के नहीं आने पर परिवार बनाता था भोजन
- कोरोना काल में सुबह पांच बजे हलवाई आकर संजय शर्मा के स्वर्ण जयंती नगर स्थित आवास पर खाना बनाता था। कभी-कभी हलवाई नहीं आता था तो संजय की पत्नी रागिनी शर्मा, बेटी मान्या शर्मा, नंदनी शर्मा खाना बनाकर पैकेट बांधते थे। इस कार्य में उनकी आठ वर्ष की बेटी अदिति भी सहयोग करती थी।
- एक दिन संजय सर मुझे अपने साथ ले गए। उनका सेवा भाव देखकर और गरीबों को भोजन बांटकर मैं इतना प्रभावित हुआ कि अब लंच होते ही खाना बांटने निकल जाता था। लोगों को जब तक हम भोजन नहीं बांट लेते थे, तब तक खुद भोजन नहीं करते थे। - महफूज अली खां, लैब असिस्टेंट, जेएन मेडिकल कॉलेज।
- संजय शर्मा कभी 100 तो कभी 200 लोगों का भोजन लेकर जाते हैं। शुरुआत में बाजार रेट पर खाना उपलब्ध कराता था, लेकिन इनकी समाजसेवा को देखकर अपना मुनाफा छोड़ दिया है। साथ में 20-30 लोगों का खाना अपनी तरफ से भेज देता हूं। - मुजम्मिल खान, पूरी-कचौड़ी विक्रेता, मेडिकल रोड।
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