अभिषेक शर्मा, अलीगढ़।
एक दौर था, जब शहर की बड़ी और आलीशान कोठियों में अनौना हाउस, धर्मपुर हाउस और पहासू हाउस शुमार थीं। जिनमें अलीगढ़ मुस्लिम विवि की स्थापना के शुरुआती दौर की बैठकें हुईं थीं। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। बंटवारे के बाद अनौना और धर्मपुर हाउस शत्रु संपत्ति घोषित हो गए।
अनौना हाउस कोठी की बात करें तो यह अनौना नवाब की बेटी को उनके पिता से विरासत में मिली। हालांकि बंटवारे के दौर में वे खुद पाकिस्तान नहीं गईं और उनका देहांत भी यहीं हुआ। उनके एक बेटे सहित कुछ अन्य परिजन पाकिस्तान चले गए थे।
ये है अनौना हाउस कोठी का इतिहास
अनौना नवाब की बेटी रफीकुनिशा के परपौते अब्दुल हफीज आज भी इसी कोठी में रहते हैं। वे शासन प्रशासन की इस संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित करने की प्रक्रिया को गलत बताते हैं। इनका दावा है कि पूर्वज रफीकुनिशा को यह कोठी उनके पिता अनौना नवाब से मिली थी।
उन्होंने इस संपत्ति को 1928 में अलल औलाद वक्फ घोषित करते हुए अपने शौहर को मुतवल्ली बनाया। उनके देहांत के बाद बेटे को मुतवल्ली बनाया गया। 1947 में बंटवारे के समय उनके बेटे पाकिस्तान चले गए। मगर वे नहीं गईं और बेटे के जाने पर उन्होंने अपने पौते यानि मेरे पिता मुजीबअली खान को मुतवल्ली बनाया। बंटवारे के बाद इस संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित किया गया। अब इस कोठी में 91 परिवार किराये पर हैं।
हरदुआगंज में है नवाब छतारी परिवार के फर्म मैनेजर की शत्रु संपत्ति
तहसील के अभिलेखों के अनुसार हरदुआगंज कस्बे में थाने के बगल में करीब साढ़े छह बीघा जमीन आज भी नवाब छतारी परिवार के फर्म मैनेजर के नाम दर्ज है और शत्रु संपत्ति है। तहसील के अभिलेख व कस्बे के जानकार बताते हैं कि नवाब रसीद अली खां की इस जमीन की देखरेख उनके फर्म मैनेजर हरदुआगंज निवासी मो.सईद खां किया करते थे।
यह जमीन उनके फर्म मैनेजर मो.सईद खां के नाम तहसील अभिलेखों में दर्ज हो गई। इसमें खेती हुआ करती थी। बंटवारे के समय 1974 में मो.सईद खां परिवार के साथ पाकिस्तान के लाहौर जनपद के बहजोई में जाकर बस गए। तहसील अभिलेख में आज भी उनका नाम व लाहौर का पता दर्ज है। हालांकि इस शत्रु संपत्ति में से कुछ जमीन पर बिजलीघर बन गया है। कुछ पर अवैध कब्जे भी हुए, जिसमें प्रशासन ने मुकदमे कराए।
जलाली के पांच जमींदारों के घर की नीलामी, कृषि भूमि बेनामी
इतिहासकारों के अनुसार मोहम्मद बिन तुगलक के बाद भारत भ्रमण पर आए मोरक्को के यात्री इब्न-ए-बतूता ने जलाली को भारत का बेहतर सांप्रदायिक सौहार्द वाला कस्बा बताया। उस जलाली में कई जमींदार परिवार बंटवारे के समय पाकिस्तान गए। तहसील के अभिलेख आज भी इस बात की गवाही देते हैं। मगर सिस्टम की अनदेखी के कारण कुछ जमींदारों की कोठियां और घर तो शत्रु संपत्ति घोषित होने के बाद नीलाम कर दिए गए। उनकी कृषि भूमि आज भी बेनामी पड़ी हैं। उसका लोग इस्तेमाल करते आ रहे हैं।
यहां के जमींदार रहे आले हसन, इजलाल हसन, हफीजुल हसन, इनाम हसन, जमाल हसन, मो.हुसैन, अली जाफर वे लोग थे, जो बंटवारे के समय पाकिस्तान गए और उनकी कोठियां कृषि भूमि घोषित हुई। जिला प्रशासन के कस्टोडियन बनने के बाद उनके मकानों को जरूर ीलाम कर दिया । मगर इन परिवारों से जुड़ी करीब 500 बीघा से ज्यादा कृषि भूमि बेनामी पड़ी है। इनमें अकेले इजलाल हसन के परिवार की जमीनों को लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके नाम आज भी तहसील अभिलेख में दर्ज हैं। कस्बे के परवरिश हुसैन के अनुसार 100 परिवार ऐसे भी थे, जो मजदूर व छोटे तबके से थे, जो पाकिस्तान चले गए। उनकी जमीन व मकान यहां रह रहे लोगों ने नीलामी में खरीद लिए।