मथुरा। डॉ. गोपाल चतुर्वेदी।
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वृंदावन (मथुरा)। यमुना के तट पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद हरिद्वार से पूर्व लगने वाला कुंभ का मेला ब्रज संस्कृति का विराट पावनोत्सव है। शास्त्रों व पुराणों में इसे गोलोक धाम का कुंभ भी माना गया है। वृंदावन कुंभ श्रीमद्भागवत संगत परम भागवत पर्व है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 16वें अध्याय में इसका विस्तार से वर्णन है। यह कहना है ब्रज साहित्य सेवा मंडल के अध्यक्ष डॉ. गोपाल चतुर्वेदी का।
वह बताते हैं कि वृंदावन कुंभ उस समय आयोजित होता है जब पूरे एक माह तक सूर्य व बृहस्पति कुंभ राशि में स्थित रहते हैं। फाल्गुनी अमावस्या को चंद्रमा भी उसमें प्रवेश कर जाता है। वृंदावन में यह आयोजन मुगलकाल में अत्याचारों के बाद सर्वप्रथम सन् 1723 में लगा था। इससे पूर्व यह मुगल सम्राट औरंगजेब के शासन व उसके अत्याचारों के कारण नहीं लग सका था। वर्तमान में इस आयोजन को लेकर यमुना में प्रदूषण की स्थिति चिंताजनक है। वृंदावन कुंभ मुख्यत: यमुना स्नान का ही पर्व है। इसके साथ ही यमुना जी में जल की कमी है। इससे वृंदावन कुंभ में आने वाले असंख्य भक्तों श्रद्धालुओं की भावना को ठेस पहुंचेगी।