उदास सा ताजमहल और उसके नीचे छिजती सी यमुना की ठहरी हुई धारा, यही है शायद अब आगरा की पहचान। शहर में पीपल मंडी का काला महल जहां कभी मिर्जा गालिब ने अपनी काव्य साधना शुरू की, नूरी दरवाजा की बगीची जहां कभी सरदार भगत सिंह की बुलंद आवाज गूंजा करती थी, अब शांत है। शहर के तमाम ऐसे ठीये जहां से स्वतंत्रता संग्राम की अग्नि को लौ मिली थी, अब वीरान हो गए हैं। साहित्यकारों, रचनाकारों और रंगकर्मियों की जहां महफिलें सजा करती थीं, डिजिटल दौर में वो जगह अब गुमनाम हैं।
पीली कोठी: राजनीति की दशा-दिशा पर होता था मंथन
वजीरपुरा स्थित लक्ष्मण सिंह की पीली कोठी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का जमघट लगता था। राजनीति की दशा और दिशा पर मंथन होता। स्वतंत्रता संग्राम सैनानी सरोज गौरिहार ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू भी यहां आकर रुकी थीं।
अंटाघर में जुटते थे खेल प्रेमी
आगरा कैंट स्टेशन के पास बने रेलवे के हाल में जहां अब रामलीला होती है, वहां एक विशाल भवन था। अंटाघर कहे जाने वाले इस भवन में खेल प्रेमी जुटा करते। रेलवे कर्मचारी और खिलाड़ी थापा इंद्रेश कुमार उर्फ इंदु रामप्रसाद, जेपी ओबराय शाम को यहां आया करते थे। आगरा में खेल की क्या स्थिति है, कैसे रेलवे के खेल को आगे बढ़ाया जाए, योजनाओं पर चर्चा होती।
पीली कोठी
- फोटो : अमर उजाला
नागरी प्रचारिणी: गलियों को दी तीर्थ की अस्मिता
एमजी रोड स्थित नागरी प्रचारिणी सभा बाबू गुलाब राय, महेंद्र, पंडित हरिशंकर शर्मा, डॉ. सत्येंद्र, उल्फत सिंह, डॉ. पदम सिंह शर्मा कमलेश,, राजनाथ शर्मा जैसे साधक की कर्म स्थली रही। इसी भवन के पीछे गोकुलपुरा मोहल्ला की गलियों को अमृत लाल नागर, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. रांगेय राघव जैसे मनीषियों ने साहित्यकारों के लिए तीर्थ की अस्मिता दी। यहां दिनभर साहित्यकारों का आना जाना लगा रहता था।
दादाबाड़ी बगीची में होती थी गुप्त बैठकें
दादाबाड़ी बगीची स्वतंत्रता संग्राम की साक्षी है। यहां सेनानियों की गुप्त बैठकें हुआ करती थीं। इस समय आगरा महानगर की जहां कोतवाली है, वहां कभी बगीची हुआ करती थी।
किदवई पार्क में होती थी रंगकर्म पर चर्चा
किदवई पार्क में आगरा इप्टा के संस्थापक सदस्य राजेंद्र रघुवंशी के निवास पर रंगकर्मियों की महफिल जमती थी। मदन मोहन दरवाजे के पास रंगकर्मी रिहर्सल करते। आगरा इप्टा के दिलीप रघुवंशी ने बताया कि फुलट्टी बाजार में पुराने बैंक के फाटक में स्थायी रंगमंच था। इस कटरे का नाम हाफिज जी का कटरा हाफिज मुहम्मद अब्दुला के नाम पर ही पड़ा। एमजी रोड और लेडी लॉयल के पास चाय की दुकान पर भी रंगकर्मी जुटते थे। किताबघर, जहां अब फाइन आर्ट स्टूडियो है वहां साहित्य प्रेमियों का जमघट लगता था।
कैपरी दरोगा में होती थी साहित्यकारों की गुफ्तगू
राजा मंडी के मोड़ पर कैपरी दरोगा नाम से इमारत हुआ करती थी। यहां अब मार्केट बन गया है। कैपरी दरोगा में साहित्यकार अपनी रचनाओं पर चर्चा करते थे। राजेन्द्र यादव, घनश्याम अस्थाना, अनिल शनीचर, शैल चतुर्वेदी की महफिल यहां जमती और साहित्य पर चर्चा होती।
चौबे जी का कटरा में जुटते थे कलाकार
चौबे जी का कटरा में सहित्यकार पंडित ऋषिकेश चतुर्वेदी का घर शहर के गणमान्य लोगों और कलाकारों का ठिया था। हर सोमवार को यहां बैठक जमती और शहर पर घंटों चर्चा होती। संगीतज्ञ और लोकगायक भी आते थे। पृथ्वीराज कपूर, श्याम नारायण पांडे, वृंदावन लाल वर्मा फिराक गोरखपुरी भी इन बैठकों में शामिल हुए।
चाय की दुकान पर उमड़ता था हुजूम
सरदार भगत सिंह शहीद स्मारक समिति के महामंत्री राजवीर सिंह बताया कि राजा मंडी चौराहा के पास चाय की दुकान हुआ करती थी। यहां विभिन्न कॉलेजों के प्रोफेसर और छात्रों का हुजूम उमड़ता था। रामजीलाल सुमन और दिनेश गौतम यहां बैठते थे। अब इस स्थान पर कपड़ों का शोरूम खुल गया है।