पूर्व न्यायाधीश चंद्रशेखर उपाध्याय व अन्य
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हिंदी से न्याय के लिए 30 साल से मुहिम चला रहे उत्तराखंड राज्य विधिक परिषद के सदस्य एवं पूर्व न्यायाधीश चंद्रशेखर उपाध्याय ने अब संगठन बनाकर संघर्ष करने का एलान किया है। उन्होंने हिंदी से न्याय संचालन समिति गठित की है। उनका कहना है कि इसके माध्यम से दो करोड़ लोगों के हस्ताक्षर कराए जाएंगे। यूपी में लक्ष्य दस लाख का है। इसमें एक लाख लोग आगरा से होंगे।
यहां का लक्ष्य पूरा होने पर मार्च में समाजसेवी अन्ना हजारे को बुलाकर हस्ताक्षर युक्त पत्र उन्हें सौंपा जाएगा। इसकी प्रतिलिपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजी जाएगी, ताकि सरकार जनता की आवाज सुने। शनिवार को सिकंदरा स्थित रेनबो हॉस्पिटल के सभागार में मीडिया से रूबरू उपाध्याय ने बताया कि संगठन में यूपी की जिम्मेदारी डॉ. देवी सिंह नरवार को सौंपी गई है।
उत्तराखंड में समग्र गंगा अभियान चलाने वाले धर्मेंद्र डोडी और दिल्ली में मलिन बस्तियों में शिक्षा की अलख जगा रहे गौतम रोहित को दायित्व सौंपा गया है। राजस्थान, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में भी हिंदी से न्याय की मुहिम गति पकड़ चुकी है। उत्तराखंड में 7.5 लाख हस्ताक्षर पहले ही कराए जा चुके हैं।
पहला हस्ताक्षर आगरा कॉलेज के प्राचार्य करेंगे
पंडित दीन दयाल उपाध्याय के प्रपौत्र चंद्रशेखर उपाध्याय आगरा के ही हैं। मुहिम का आगाज उन्होंने यहीं से ही 23 मार्च 1990 को किया था। उन्होंने आगरा बताया कि उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो ... जैसी कालजयी कविता के रचयिता प्रसिद्ध कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी के पुत्र डॉ. विनोद माहेश्वरी पहला हस्ताक्षर करेंगे। विनोद आगरा कॉलेज के प्राचार्य हैं।
लोकसभा में सवाल उठने पर भी खामोश क्यों है मोदी सरकार ?
चंद्रशेखर उपाध्याय ने लोकसभा की कार्यवाही की वीडियो क्लिप दिखाई। इसमें दो मार्च 2015 को पिछली मोदी सरकार में राज्यमंत्री अर्जुन राम मेदवाल बोल रहे हैं। मेदवाल ने कहा कि अनुच्छेद 348 में संशोधन कर यह व्यवस्था की जाए कि उच्च और उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता हिंदी में भी बहस कर सकें।
इसके बाद तत्कालीन शहरी विकास मंत्री (वर्तमान में उपराष्ट्रपति) वैंकया नायडू ने कहा कि वकीलों को हिंदी में बहस करने का अधिकार दिया जाना चाहे। चंद्रशेखर उपाध्याय ने बताया कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते 2012 में केंद्र सरकार से मांग की थी कि गुजरात उच्च न्यायालय में हिंदी में कामकाज की व्यवस्था कराई जाए।
हरियाणा में मिल चुकी है सफलता
चंद्रशेखर ने कहा कि लोकसभा में सवाल उठने पर भी मोदी सरकार खामोश क्यों है? अदालतों में कामकाज हिंदी में न होने के कारण न तो वादकारी को यह पता होता है कि वकील ने उसके पक्ष में क्या दलील रखी? न ही इसकी जानकारी होती है कि न्यायालय ने दलील पर क्या कहा?
उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 348 में अस्थायी रूप से यह व्यवस्था की गई थी कि अदालतों में कामकाज नई व्यवस्था होने तक अंग्रेजी में होगा। पीएम कहते हैं कि उनकी सरकार में अस्थायी जैसे शब्द के लिए कोई जगह नहीं है तो फिर अंग्रेजी से न्याय की अस्थायी व्यवस्था क्यों चली आ रही है? उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों से हरियाणा में हिंदी में न्याय मुहिम को सफलता मिली है।