करहल। कसबा स्थित वनखंडेश्वर महादेव का मंदिर सदियों पुराना है। मान्यता है यहां वनखंडेश्वर महाराज संयोगिता की भक्ति से प्रकट हुए थे। जनपद ही नहीं प्रदेश के विभिन्न स्थानों से लोग यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं।
बताया जाता है कि दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान जब कन्नौज से संयोगिता का हरण करके ले जा रहे थे तो रात होने पर उनके काफिले ने वनखंडेश्वर क्षेत्र में पड़ाव डाला। संयोगिता भगवान शिव की परमभक्त थीं। सुबह होने पर उन्होंने सम्राट पृथ्वीराज से कहा कि वह भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करना चाहती हैं। सम्राट पृथ्वीराज ने आस-पास के क्षेत्रों में भगवान भोलेनाथ के मंदिर की तलाश की। कोई मंदिर नहीं था जहां उन्हें ले जाकर पूजा कराई जा सके। इस स्थिति में संयोगिता ने ह्दय से भगवान भोलेनाथ को याद किया कि हे, भगवान यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो यहीं पर पूजा का प्रबंध करा दें। संयोगिता की पुकार पर एक शिवलिंग जमीन से प्रकट हुआ, जिसे देखकर संयोगिता भाव विभोर हो गईं। सम्राट पृथ्वीराज समेत जिसने भी शिवलिंग के प्रकट होने के बारे में सुना चमत्कृत रह गया। विधि विधान से उसकी पूजा अर्चना की गई। राजा ने भगवान शिव की विशेष कृपा मानते हुए उसी स्थल पर मंदिर का निर्माण करा दिया।
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हर सोमवार को पहुंचते हैं भक्त
पुजारी शिवसुंदर पांडेय ने बताया कि वनखंडेश्वर महादेव के मंदिर पर वर्ष के प्रत्येक सोमवार को पूजा-अर्चना के लिए भक्त पहुंचते हैं। कोरोना महामारी के कारण मेला तो नहीं लग रहा है लेकिन बड़ी संख्या में भक्त यहां पूजा अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं।