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ब्रज में फाग: अब चौपाई गायन में नहीं दिखतीं घाघरा और कमीज पहने महिलाएं

Fri, 19 Mar 2021 12:01 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
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बरसाना की लठामार होली (फाइल) - फोटो : Amar Ujala
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मथुरा के नंदगांव और आसपास के क्षेत्र में चौपाई और फाग गायन के दौरान पारंपरिक परिधान घाघरा, ओन्ना और कमीज पहने महिलाएं अब नजर नहीं आतीं। अब इन पोशाकों का स्थान सूट सलवार ने ले लिया है। करीब दो दशक पूर्व तक वसंत पंचमी लगते ही चौक चौराहों पर चौपाई, होली और सांखियों का दौर शुरू हो जाता था। अब चौपाई गायन सिर्फ परंपरा निभाने तक सीमित है।

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चौपाई गाने वाली मंडलियां दूरदराज से आती थीं। रात-रात भर चौपाई और फाग गायन होता था। इस दौरान महिलाएं जाट समाज की महिलाएं घाघरा, ओन्ना और कमीज पहने होती थीं। इन सबके ऊपर वे ब्रज की ओढ़नी ओढ़ती थीं। 

पैरों में चांदी के कडूला, छैलकरे, हाथों में बाजूबंद, गले में सोने की मुहर, माथे पे टीका, नाक में नथनी, कानों में सोने के कुंडल, कमर में कौंदनी, हाथों में हथफूल आदि गहने पहने महिलाएं सोलह शृंगार से सुसज्जित होकर चौपाई के हुरियारों के सामने पहुंचती थीं। 

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उनके सिर पर थाली में लड्डू, शक्कर, गुड़, बतासे, बेर, संतरा, मिठाई और हाथों में छोटे-छोटे शीशे होते थे। इन शीशों से प्रतिबिंब को परावर्तित कर हुरियारों को छेड़ती थीं। चौपाई जब शुरू होती थीं तो हुरियारे नाच-नाचकर हुरियारिनों के सिर से थाली ले जाते थे। 

बाद में थाली में रखे सामान को प्रसाद के रूप में बांटकर खाते थे। प्रेम और सौहार्द को बढ़ाने में चौपाइयों का महत्वपूर्ण स्थान था। महिलाओं के पहनावे से ब्रज की संस्कृति झलकती थी। 

चौपाइयों की जगह डीजे ने ले ली
नंदगांव के पूर्व चेयरमैन नथोली भगत ने कहा कि टीवी, मोबाइल के दौर में परंपरागत चीजें लुप्त होती जा रही हैं। चौपाइयों के स्थान पर डीजे पर नाचना ही लोगों का शौक रह गया है। 

पाश्चात्य संस्कृति हो रही हावी
नंदगांव निवासी ज्ञान सिंह ने कहा कि आज के दौर की युवा पीढ़ी पुराने पहनावे को पसंद नहीं करतीं। पाश्चात्य संस्कृति ब्रज की संस्कृति पर हावी हो रही है। 
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