मुगलिया दौर की 93 धरोहरों को समेटे फतेहपुर सीकरी के स्मारकों की देखरेख में लापरवाही बरती जा रही है। ताजमहल की तरह ही फतेहपुर सीकरी के स्मारकों के पत्थर दरकने लगे हैं।
ताजमहल तामीर होने से 75 साल पहले बनाए गए फतेहपुर सीकरी के स्मारकों के पत्थर निकल रहे हैं। सीकरी की शान बुलंद दरवाजा और बादशाही दरवाजे के पत्थरों के निकलने से यह बदरंग दिखने लगा है।
वहीं महल परिसर में दीवान ए आम, दीवान ए खास में भी संरक्षण की दरकार है। कभी लंदन से बड़ा और व्यवस्थित शहर रहे फतेहपुर सीकरी की शान है बुलंद दरवाजा।
बुलंद दरवाजा
- फोटो : अमर उजाला
लेकिन इसके संरक्षण में लापरवाही के कारण इसके कई पत्थर टूट चुके हैं। काले और सफेद पत्थरों की डिजाइन का ज्यादातर हिस्सा निकल चुका है। यही हाल बादशाही दरवाजे का है।
इस दरवाजे के आर्च के ऊपर के पत्थर और हिरन मीनार की ओर की अष्टकोणीय डिजाइन के पत्थर निकल चुके हैं। इन दोनों ही दरवाजों से वीवीआईपी शेख सलीम चिश्ती की दरगाह परिसर में प्रवेश करते हैं।
पुरातत्वविद अधीक्षण डॉ. भुवन विक्रम का कहना है कि समय और प्राकृतिक कारणों से स्मारकों में क्षरण प्रक्रिया चलती है। कुछ जगह पत्थर निकले हैं, जिन्हें दोबारा लगाने और संरक्षण की योजनाएं बन रही हैं। फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजे और अन्य स्मारकों पर संरक्षण कार्य कराया जाएगा।
417 साल पहले बना था बुलंद दरवाजा
बुलंद दरवाजा
- फोटो : अमर उजाला
दुनिया का सबसे बड़ा दरवाजा फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाजा है, जिसे मुगल शहंशाह अकबर ने गुजरात विजय के बाद बनवाया था। शेख सलीम चिश्ती दरगाह परिसर का यह मुख्य दरवाजा है।
जो लाल पत्थर से बनाया गया है। 54 मीटर ऊंचे इस दरवाजे तक पहुंचने के लिए 42 सीढ़ियां हैं। फतेहपुर सीकरी में पहाड़ी पर बनाया गया बुलंद दरवाजा कई किमी दूर से ही नजर आता है और सीकरी की पहचान है।