आगरा। सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को उपचार के खर्चों के लिए मुआवजा प्राप्त करने में वर्षों की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं और कई मामलों में तो निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट तक अपील करनी पड़ती है। यह पूरी व्यवस्था एक सड़क दुर्घटना पीड़ित के लिए अत्यंत अन्यायपूर्ण और अमानवीय स्थिति उत्पन्न करती है।
इस मुद्दे पर हेमंत जैन की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है। इसकी पैरवी अधिवक्ता केसी जैन कर रहे हैं। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय में याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की खंडपीठ के समक्ष हुई।
अधिवक्ता केसी जैन ने बताया कि सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से धारा 162 के तहत बनाई गई योजना में डेढ़ लाख रुपये तक का उपचार सात दिन के अंदर हो सकता है। न्यायालय ने इस तरह की सीमाओं पर आश्चर्य व्यक्त किया। गंभीरता से प्रश्न उठाया कि सड़क दुर्घटनाओं की प्रकृति को देखते हुए ऐसी सीमा लगाना कैसे व्यावहारिक हो सकता है। अब मामले की अगली सुनवाई अब 20 नवंबर को होगी।
बिना सीमा चिकित्सा सुविधा देने की प्रभावी योजना बने
अधिवक्ता केसी जैन ने तर्क रखा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 162(1) बीमा कंपनियों को दुर्घटना पीड़ितों को तत्काल चिकित्सा सुविधा प्रदान करने के लिए बाध्य करती है। यह सुविधा बिना किसी वित्तीय सीमा के होनी चाहिए। धारा 147 के अनुसार, बीमा कंपनी की उपचार संबंधी देयता अनलिमिटेड है।
किसी भी प्रकार की सीमा का प्रावधान नहीं है। यदि सर्वोच्च न्यायालय इन तर्कों को स्वीकार करते हुए बीमा कंपनियों से कैशलेस, बिना-सीमा चिकित्सा सुविधा देने की प्रभावी योजना लागू कराने का निर्देश देता है तो इससे हर वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लगभग 3 लाख लोगों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।