आगरा। अबुल उला स्थित करबला में मोहर्रम के मौके पर ताजिया दफन करते अकीदतमंद। अमर उजाला
आगरा। मोहर्रम की दसवीं तारीख यानी रोज ए आशूरा पर शुक्रवार को शिया इमामबाड़ों में अलविदाई मजलिसों के बाद अंजुमन ए पंजेतनी की ओर से अमीर अहमद ने अलविदाई नौहा ‘रोके कहो अहले अजा अलविदा...’ पढ़ा तो सीनाजनी और मातम का दौर शुरू हो गया। अकीदतमंदों ने खंजर, कमां और छुरियों से अपने शरीर पर वार करके गम ए हुसैन मनाया। दूसरी ओर, न्यू आगरा, पंचकुइयां और सराय ख्वाजा करबला में ताजिये सुपुर्द ए खाक किए गए।
शिया इमामबाड़ों से इस बार ताजियों व अलम का जुलूस नहीं निकाला गया। सुबह शाहगंज के पुराने इमामबाड़े में अलविदाई मजलिस में मौलाना शाहिद अली ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत को बयान किया। इसके बाद अंजुमन ए पंजतनी के मातमदारों ने सीनाजनी शुरू कर दी। मसूद मेहंदी, अली मंजर जाफरी, हुसैन मेहंदी, सुहेल जाफरी ने ‘कदीमी मर्सिया आज शब्बीर पे क्या आलम ए तन्हाई है...’, अब्बास अमीर जाफरी व बशारत अली ने ‘मेरे गरीब हुसैन मेरे गरीब हुसैन...’ नौहा पढ़ा तो अमीर अहमद के नौहे ‘रोके कहो...’ के साथ ही खंजर व छुरियों का मातम शुरू हो गया। रात आठ बजे पुराना इमामबाड़ा में मजलिस शाम ए गरीबां हुई, जिसमें मौलाना मोहम्मद मुदस्सिर हुसैन ने यजीदी फौज के जुल्मों की दास्तां बयां की।
दूसरी ओर, शहर में मोहर्रम पर इस बार ऐतिहासिक पाय चौकी के इमामबाड़े में चौकी रखी गई थी। जिन घरों में ताजिए रखे गए थे, उन्हें लोगों ने न्यू आगरा करबला, पंचकुइयां और सराय ख्वाजा में सुपुर्द ए खाक किया। लोग जुलूस की जगह गाड़ियों में ताजिये लेकर करबला में पहुंचे। फातिहाख्वानी की गई। जगह जगह शर्बत के शबील लगाए गए। हिंदुस्तानी बिरादरी के अध्यक्ष डॉ. सिराज कुरैशी ने बताया कि इस बार ताजिएदारों ने खामोशी के साथ ताजिये सुुपुर्द ए खाक किए। महिलाओं ने रोजा रखा। शर्बत आदि की शबीलें भी लगाई गईं।