फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मथुरा: धारा 307 के मामलों में फर्जीवाड़ा, एसएसपी कर रहे जांच, कई पुलिसकर्मी निशाने पर

Wed, 08 Jul 2020 12:15 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा

सार

  • दो मामलों में एसएसपी ने की कार्रवाई, दो दर्जन से अधिक मामलों की जांच शुरू  
विज्ञापन
एसएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

मथुरा जिले के थानों में जानलेवा हमले (आईपीसी की धारा 307) के फर्जी मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इसकी शिकायतों पर एसएसपी ने जांच शुरू की है। प्राथमिक जांच में सामने आया है कि मनमानी मेडिकल जांच कराकर मामूली झगड़ों के मामलों में धारा 307 बढ़ाई जा रही है। एसएसपी इस तरह के दो मामलों में एक दरोगा व जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई भी कर चुके हैं।

विज्ञापन

 

एसएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर ने जिले की कमान संभालने के बाद अपराध की स्थिति समझने की कोशिश की तो यह तथ्य सामने आया कि ज्यादातर मामले जानलेवा हमले के दर्ज किए जाते हैं और मामूली झगड़े के मुकदमे कुछ समय बाद धारा 307 में तरमीम किए जाते हैं। ऐसे मामलों की शिकायतें भी बहुत थीं। 



एसएसपी ने गहनता से जांच की तो पता चला कि धारा 307 के नाम पर फर्जीवाड़ा किया जा रहा है। थाना गोवर्धन में दर्ज धारा 307 के एक मामले में दरोगा प्रदीप कुमार के खिलाफ विवेचना में लापरवाही व मनमानी के आरोप में निलंबन की कार्रवाई की गई। इसी तरह एक अन्य मामले में भी एक जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई। दो दर्जन मामले अभी जांच में हैं, जिन पर शीघ्र कार्रवाई की जा सकती है। 
विज्ञापन

जिला अस्पताल के कर्मचारी जांच के घेरे में  

झगड़े अथवा हमले के मामले में जिला अस्पताल में स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाता है। चोटों के आधार पर ही धारा 307 लगाने अथवा न लगाने का निर्णय होता है। स्वास्थ्य परीक्षण करने में स्वास्थ्य कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों की मिलीभगत की शिकायतें आती रही हैं। एसएसपी ने स्वास्थ्य परीक्षण करने वाले कर्मचारियों को भी जांच में शामिल किया है। साथ ही उन पुलिसकर्मियों की भी जांच होगी जिनकी शिकायतें की गई हैं।

चार्जशीट लगाने में की जाती है जल्दबाजी

धारा 307 लगाने से पहले पर्याप्त साक्ष्य होना जरूरी है, लेकिन मनमाने तरीके से स्वास्थ्य परीक्षण रिपोर्ट तैयार कराकर आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया जाता है। चार्जशीट लगाने में भी जल्दबाजी की जाती है। किसी को भी झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेज दिया जाता है। एसएसपी द्वारा उन केसों की जांच की जा रही है, जिनमें आरोपी की शीघ्र गिरफ्तारी और चार्जशीट लगाई है, लेकिन धारा 307 लगाने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। 
विज्ञापन

पहले एनसीआर, बाद में एफआईआर, फिर 307 

किसी भी व्यक्ति को फर्जी मुकदमे में फंसाने के लिए पुलिस से मिलीभगत कर गुपचुप तरीके से एनसीआर दर्ज कर लिया जाता है। एनसीआर की जानकारी तक आरोपी को नहीं दी जाती। बाद में फर्जी मेडिकल रिपोर्ट के अधार पर धारा 307 में एनसीआर को मुकदमे में तरमीम कर दिया जाता है। जब पुलिस आरोपी को गिरफ्तार करने पहुंचती है तो आरोपी को घटना का पता चलता है। इस तरह के कई मामले जांच में शामिल किए गए हैं। 
 
एसएसपी डॉ. गौरव ग्रोवर ने बताया कि धारा 307 के मुकदमे दर्ज करने में पुलिसकर्मियों की मनमानी की काफी शिकायतें आई थीं। सभी शिकायतों पर जांच शुरू की गई है। कुछ मामलों में फर्जी मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने में पुलिसकर्मियों की जिला अस्पताल के स्वास्थ्य कर्मचारियों से मिलीभगत भी सामने आई है। सभी बिंदुओं पर गहनता से जांच की जा रही है। जिन पुलिसकर्मियों की लापरवाही सामने आई है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। 
 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें