बांग्लादेश में तख्ता पलट के बाद देश छोड़ने को मजबूर हुई पांच बार की प्रधानमंत्री शेख हसीना तीन बार बंदूकधारियों के हमले में बाल-बाल बची हैं। 15 अगस्त 1975 को पिता शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद पौने छह साल तक भारत में रहीं शेख हसीना जब बांग्लादेश लौटीं तो चार साल के अंदर तीन बार उन पर हमला हुआ। हमले में जमात ए इस्लामी और खालिस्तानी आतंकियों पर भी आरोप लगाए गए थे।
अमर उजाला आर्काइव के पुराने पन्नों में दर्ज है कि वर्ष 1989 में पहली बार अवामी लीग की अध्यक्ष शेख हसीना पर बंदूकधारियों ने हमला किया था। उनके धानमंडी स्थित घर पर हुए हमले में 28 गोलियां चलाई गई थीं। इसमें छात्र लीग पर आरोप लगाए गए थे। इसके दो साल बाद 8 अक्तूबर 1991 को खुलासा किया गया था कि शेख हसीना की हत्या के लिए खालिस्तानी आतंकियों से संपर्क साधा गया था।
बांग्लादेश के केन्या स्थित उच्चायुक्त लेफ्टिनेंट कर्नल शरीफुल हक पर आरोप था कि वह 1975 में शेख मुजीब की हत्या के षड्यंत्र के सूत्रधारों में से एक थे। शरीफुल हक ने लंदन में खालिस्तानी नेताओं से मुलाकात की थी, उसके दो साल बाद फिर से 23 जनवरी 1993 को शेख हसीना पर चटगांव की रैली में हमला किया गया। बंदूकधारियों की गोलीबारी में 50 लोग घायल हुए थे।
सेना पर जताया था भरोसा
बांग्लादेश की पांच बार प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद सेना ने कमान संभाली है, लेकिन 30 साल पहले 16 नवंबर 1994 को अवामी लीग अध्यक्ष शेख हसीना को सेना पर पूरा भरोसा था कि सेना सत्ता पर काबिज नहीं होगी। विपक्ष की नेता के तौर पर बोगुस शहर में हसीना ने तब कहा था कि सेना के सत्ता पर काबिज होने की कोई संभावना ही नहीं है। उस समय बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया थीं।