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UP: गर्भवती भूल से भी न करें ये छह गलतियां...प्री-मेच्योर डिलीवरी का खतरा, इसलिए बच्चों में मिल रहे ये रोग

Mon, 24 Mar 2025 09:08 AM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा

सार

ज्यादा बच्चों से 15 फीसदी प्री-मेच्योर डिलीवरी हो रही है। यही वजह है इन बच्चों में  मंदबुद्धि, मानसिक-शारीरिक विकार मिल रहे हैं। इसके साथ ही इन बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम मिल रही है।
 
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Pregnant Women Demo - फोटो : freepik.com
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विस्तार
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ज्यादा बच्चे, प्रदूषण और खून की कमी के चलते देश में 15 फीसदी प्री-मेच्योर डिलीवरी(समय पूर्व प्रसव) हो रही हैं। इनमें 8 फीसदी बच्चों में मंदबुद्धि, मानसिक-शारीरिक विकार मिल रहे हैं। फतेहाबाद रोड स्थित होटल में आगरा ऑब्स एंड गायनी सोसाइटी की यूपीकॉन-2025 में विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जताई। तीन दिवसीय कार्यशाला के समापन पर चिकित्सकों ने अपनी 9-14 साल तक की बेटियों के एंटी सर्वाइकल वैक्सीन लगवाने की बात कही।
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पुणे की फोग्सी की पूर्व चेयरपर्सन डॉ. वैशाली चव्हाण ने बताया कि बीते 10-12 सालों में प्री-मेच्योर डिलीवरी तेजी से बढ़ी है। अभी 100 गर्भवती में से 15 महिलाओं के 28 सप्ताह से पूर्व प्रसव हो रहे हैं, जबकि स्वस्थ प्रसव का समय 37 सप्ताह है। इन महिलाओं के 3-4 से अधिक बच्चे थे, बार-बार गर्भधारण करने, गर्भपात होने, रक्त की कमी, संक्रमण, प्रदूषण, खराब खानपान, मोटापा की दिक्कत थी। इनके 7-8 फीसदी बच्चों में लंबाई-वजन, बौद्धिक स्तर प्रभावित मिला। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से इनके बार-बार बीमार होने का भी खतरा रहता है। कार्यशाला में डॉ. आरती मनोज, डॉ. एके सिंह, डॉ. विशाल चौहान, डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा, डॉ. जयदीप मल्होत्रा, डॉ. शिखा सिंह, डॉ. निधि गुप्ता, डॉ. मोहिता पेंगोरिया, डॉ. सीमा सिंह, डॉ. पूनम यादव, डॉ. रचना अग्रवाल, डॉ. मीनल जैन, डॉ. सविता त्यागी, डॉ. अनु पाठक आदि ने भी व्याख्यान दिए।

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बेटियों को दें एंटी सर्वाइकल वैक्सीन की सौगात
यूपीकॉन-2025 की अध्यक्ष डॉ. सरोज सिंह और सचिव डॉ. रिचा सिंह ने लोगों से कहा कि सर्वाइकल कैंसर के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे बचाव के लिए 9-14 साल तक की उम्र में एंटी सर्वाइकल वैक्सीन की दो डोज और 15 से 26 साल तक की उम्र में तीन डोज लगती हैं। इन्होंने लोगों से कहा कि वे अपनी बेटियों के जन्मदिन पर एंटी सर्वाइकल वैक्सीन की डोज लगवाकर सौगात दें। जरूरतमंदों के लिए सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए।

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माइक्रो प्लास्टिक से बांझपन, 30-35 की उम्र में मीनोपॉज
जनरल सर्जन डॉ. मीता कुलश्रेष्ठ ने कहा कि प्लास्टिक के सामान में खाने पीने की सामग्री रखने से शरीर में माइक्रोप्लास्टिक पहुंच रही है। इससे फेफड़ों, हृदय, रक्तवाहिकाओं, यहां तक कि अब माताओं का दूध भी अछूता नहीं रहा। इससे बांझपन और 30-35 की उम्र में मीनोपॉज की दिक्कत हो रही है। मधुमेह, कैंसर होने के साथ हार्माेंस भी गड़बड़ हो रहे हैं। गर्भस्थ शिशु का विकास भी प्रभावित हो रहा है। ऐसे में किचन को प्लास्टिक फ्री करने की सीख दे रहे हैं।

 
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ये दिए सुझाव:
- प्लास्टिक के सामान में खानेपीने की सामग्री न रखें।
- भोजन बनाने में नॉनस्टिक कुकवेयर का इस्तेमाल कतई न करें।
- सिंथेटिक कपड़ों के बजाय सूती, सिल्क और लेनिन का प्रयोग करें।
- किचन में खानेपीने और तेल-घी को प्लास्टिक के सामान में न रखें।
- सब्जियां, दालें, मौसमी फल अधिक खाएं। नियमित व्यायाम-योग करें।
- तला हुआ भोजन, फास्ट-जंक फूड से बचें। खुद को फिट रखें।

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