छात्र आंदोलन के बारे में सोशल मीडिया पर की गई कथित टिप्पणी के मामले में अभिनेत्री एवं सांसद कंगना रणौत के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग स्वीकार नहीं की गई। जिला जज संजय कुमार मलिक की अदालत ने शिकायत खारिज करने के मजिस्ट्रेट के आदेश को सही ठहराया।
अदालत ने वादी की रिवीजन याचिका को प्रवेश स्तर पर ही निरस्त कर दिया। वादी अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने अदालत में वाद दायर किया। आरोप लगाया कि 27 जुलाई को दिल्ली जंतर मंतर पर नीट और अन्य परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने से आहत छात्र आंदोलन कर रहे थे। सांसद कंगना रणौत ने सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम पर अमर्यादित टिप्पणी की और छात्रों को गटर जेनरेशन कहा।
शिकायत में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं और आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत मामला दर्ज कर कार्रवाई की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता न तो कथित घटना का प्रत्यक्ष पीड़ित था और न ही यह साबित कर सका कि टिप्पणी से उसे व्यक्तिगत रूप से कानूनी क्षति पहुंची। रिकॉर्ड में दाखिल उसके पुत्र के शैक्षिक प्रमाणपत्र के अनुसार वह कथित टिप्पणी के समय नाबालिग था। ऐसे में अदालत ने माना कि नीट अभ्यर्थियों के संबंध में की गई कथित टिप्पणी से उसके पुत्र के आहत होने का आधार भी स्थापित नहीं होता।
जिला जज ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर, विवादित या अमर्यादित टिप्पणी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आ सकती है। राजनीतिक या सामाजिक असहमति जरूर पैदा हो सकती है लेकिन वह अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं बन जाती। अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को आरोपी के रूप में तलब करना गंभीर विषय है और इसके लिए पहले अपराध के आवश्यक तत्वों का प्रथम दृष्टया होना जरूरी है।