बसपा और बामसेफ ने दलित सम्मान के नाम पर अपनी जड़ें जमाईं तो कांग्रेस और जनता दल के प्रति दोनों पक्षाें की नाराजगी बनी रही। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सक्रियता के बाद भी कांग्रेस दलितों के दिल में जगह नहीं बना पाई। पनवारी कांड से पहले आगरा में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री चौ. अजय सिंह, बदन सिंह, विजय सिंह राणा जैसे चेहरे जाट राजनीति के केंद्र में थे, लेकिन पनवारी कांड के बाद चौधरी बाबूलाल किसी धूमकेतु की तरह से जाटों के मजबूत नेता के रूप में उभरे।
इसी का असर रहा कि वह फतेहपुर सीकरी से निर्दलीय ही जीत गए। मंत्री, सांसद और फिर विधायक बने। जाटों के बुजुर्ग चेहरों को जाटलैंड ने नकार दिया और वह फिर राजनीति के केंद्र में कभी नहीं रहे। इन 35 सालों में फायरब्रांड बाबूलाल और उनकी तरह राजनीति करने वाले जाट चेहरों ने जगह बनाई।
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बसपा, बामसेफ ने दलितों के जीते दिल
पनवारी कांड के बाद दलित समाज ने एकजुटता दिखाई और सम्मान बरकरार रखने की लड़ाई के नाम पर बामसेफ और बसपा दलितों के दिल में जगह बनाती चली गई। राजनीतिक विश्लेषक राजीव दीक्षित के मुताबिक नई नवेली बसपा के नेता कांशीराम और मायावती ने पनवारी कांड को पूरे प्रदेश में जिंदा रखा और हर सभा में इसका जिक्र उनके स्वाभिमान के लिए किया। इसका असर यह हुआ कि बसपा ने इसके बाद हर विधानसभा चुनाव में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। बसपा से दलितों के जुड़ने का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ। जनता दल ने इस कांड के बाद दलितों से दूरी कम करने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया, लेकिन उनका दिल नहीं जीत सकी।
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