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UP: क्या है साल 1990 में हुआ आगरा का पनवारी कांड? जिससे दलित राजनीति का हुआ उदय...और चमक उठे बाबूलाल

Thu, 29 May 2025 12:12 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा

सार

 साल 1990 में आगरा के पनवारी में हुए जातीज संघर्ष के बाद एक ओर दलित राजनीति का उदय हुआ, तो वहीं नए चेहरे के रूप में चौधरी बाबूलाल चमक उठे। चौधरी बाबूलाल की राजनीति यहीं से शुरू हुई थी। 

 
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पनवारी कांड - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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तारीख 22 से 25 जून 1990, आगरा देश भर में पनवारी और अकोला की घटनाओं के कारण चर्चाओं में रहा। इसके बाद तो राजनीति एकदम बदल गई। स्थानीय स्तर पर जाट राजनीति के कद्दावरों को जनता ने अपने दिल से उतार दिया तो प्रदेश स्तर पर दलित एकजुटता के कारण दलित राजनीति का उदय हुआ।
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बसपा और बामसेफ ने दलित सम्मान के नाम पर अपनी जड़ें जमाईं तो कांग्रेस और जनता दल के प्रति दोनों पक्षाें की नाराजगी बनी रही। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सक्रियता के बाद भी कांग्रेस दलितों के दिल में जगह नहीं बना पाई। पनवारी कांड से पहले आगरा में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री चौ. अजय सिंह, बदन सिंह, विजय सिंह राणा जैसे चेहरे जाट राजनीति के केंद्र में थे, लेकिन पनवारी कांड के बाद चौधरी बाबूलाल किसी धूमकेतु की तरह से जाटों के मजबूत नेता के रूप में उभरे।

इसी का असर रहा कि वह फतेहपुर सीकरी से निर्दलीय ही जीत गए। मंत्री, सांसद और फिर विधायक बने। जाटों के बुजुर्ग चेहरों को जाटलैंड ने नकार दिया और वह फिर राजनीति के केंद्र में कभी नहीं रहे। इन 35 सालों में फायरब्रांड बाबूलाल और उनकी तरह राजनीति करने वाले जाट चेहरों ने जगह बनाई।


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बसपा, बामसेफ ने दलितों के जीते दिल
पनवारी कांड के बाद दलित समाज ने एकजुटता दिखाई और सम्मान बरकरार रखने की लड़ाई के नाम पर बामसेफ और बसपा दलितों के दिल में जगह बनाती चली गई। राजनीतिक विश्लेषक राजीव दीक्षित के मुताबिक नई नवेली बसपा के नेता कांशीराम और मायावती ने पनवारी कांड को पूरे प्रदेश में जिंदा रखा और हर सभा में इसका जिक्र उनके स्वाभिमान के लिए किया। इसका असर यह हुआ कि बसपा ने इसके बाद हर विधानसभा चुनाव में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। बसपा से दलितों के जुड़ने का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ। जनता दल ने इस कांड के बाद दलितों से दूरी कम करने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया, लेकिन उनका दिल नहीं जीत सकी।


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नुकसान में रही जनता दल और कांग्रेस
पनवारी कांड ने न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति, बल्कि केंद्र की सत्ता में मौजूद जनता दल और विपक्ष में कांग्रेस की राजनीति भी बदल दी। जनता दल इस कांड के बाद जाटों की नाराजगी का शिकार हुई तो कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का दौरा भी उन्हें दलितों से जोड़ नहीं सका। वरिष्ठ पत्रकार राजीव सक्सेना बताते हैं कि पूर्व पीएम राजीव गांधी ताज एक्सप्रेस से अपनी पत्नी सोनिया गांधी को साथ लेकर पनवारी गांव पहुंचे थे। एक महीने तक पनवारी और आगरा देशभर की राजनीति के केंद्र में बना रहा था। भरतपुर समेत राजस्थान के कई जिलों में पनवारी कांड की चिंगारी महसूस की गई थी।
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