जमीन चली गई, घर छोड़ना पड़ा, अपना आसरा नहीं बचा। अब गांव लाैटना भी मुमकिन नहीं। सरकार से जो आवास मिला, वो भी अपना नहीं हो सका। सरकारें बदल गईं। मगर, मकान की कीमत अब तक अदा नहीं की गई। आसरा बचाने के लिए चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कहीं सुनवाई नहीं हो रही। यह दर्द है 67 वर्षीय भरत सिंह कर्दम का।
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पनवारी कांड के बाद अकोला में भड़की हिंसा के मामले में आए फैसले की बात सुनकर अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने यह पीड़ा व्यक्त की। भरत सिंह और उनके भाई रूप सिंह आवास विकास काॅलोनी के सेक्टर-4 में रहते हैं। उन्होंने बताया कि पनवारी कांड के बाद बहुत कुछ खो दिया। जून 1990 में गांव में वर्तमान में राज्यसभा के सांसद रामजीलाल सुमन आए थे। उन्होंने उनका स्वागत किया था।
इससे जाट समाज के लोग नाराज हो गए। वह विरोध करने लगे। धमकी देने लगे। पुलिस ने केस लिख लिया। राजीनामा का दबाव डाला गया। भरत सिंह ने बताया कि उनकी बहन मुुंद्रा देवी की शादी थी। लगन टीका में गांव के जाट समाज के कुछ लोग शामिल हुए। इससे उनके समाज के लोग नाराज हो गए।
पंचायत बुलाकर बारात नहीं निकलने देने का एलान करने लगे। 21 जून 1990 को बरात आनी थी। मगर, बवाल की आशंका को देखते हुए बरात नहीं चढ़ सकी। 22 जून को तत्कालीन एसएसपी कर्मवीर सिंह और जिलाधिकारी अमल कुमार वर्मा ने पुलिस-पीएसी की माैजूदगी में बरात चढ़वाई। इस दाैरान बवाल हुआ और जिलेभर में उपद्रव शुरू हो गया।
शादी की रस्में पूरी होने के बाद उन्हें गांव छोड़ना पड़ा। घर से जो उठा सके, वही लेकर निकल आए। पुलिस प्रशासन ने गांव से निकालने के बाद बेसहारा छोड़ दिया। तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने आवास विकास काॅलोनी के सेक्टर-4 में दो मकान आवंटित किए। इनमें वो भाई रूप सिंह के साथ रहते हैं। पूरा परिवार जब से गांव से निकला, तब से वापस नहीं जा सका।
नहीं जमा किए 2.69 लाख रुपये
भरत सिंह का दर्द है कि सरकार ने आवास का वादा किया था। उन्हें आवास मुहैया करा दिया गया। इसके लिए 2.69 लाख रुपये आवास विकास परिषद में जमा करने थे। मगर, सरकार ने वादा पूरा नहीं किया। रकम आज तक जमा नहीं हो सकी। इस कारण आवास विकास परिषद ने एसीएम तृतीय के न्यायालय में अनधिकृत रूप से रहने का वाद दर्ज करा दिया।
अब मांग रहे वर्तमान कीमत
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने मकान की कीमत अदा नहीं की। इस पर वह रकम देने के लिए तैयार हैं। मगर, अब उनसे वर्तमान दर पर भुगतान करने के लिए कहा जा रहा है। वह जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरों के दफ्तरों के चक्कर काट चुके हैं। मगर, मकान को अपना बनाने की आस अब भी अधूरी है। कहीं कोई सुनवाई नहीं हो सकी है।
मेरा न्याय अभी अधूरा
भरत सिंह ने बताया कि वर्ष 1990 में हुए पनवारी कांड में वर्ष 2022 में फैसला आया था। तब आठ आरोपी दोष मुक्त हो गए थे। इसमें भाजपा विधायक चाैधरी बाबूलाल को भी दोष मुक्त किया गया था। पनवारी के बाद अकोला में भी बवाल हुआ था। इस मामले में अब 35 को दोषी माना गया है। इससे खुशी है। मगर, उनका न्याय अब भी अधूरा है।
परिवार सरकारी उपेक्षा का शिकार
कोर्ट के फैसले के बारे में सुनकर भरत सिंह के परिवार की साैन देवी के आंसू निकल आए। उन्होंने कहा कि सब कुछ छिन गया। किसी तरह जान बच गई। गांव में जो घर था, वो चला गया। खेती भी नहीं बची। अब गांव में भी नहीं लाैट सकते। मजदूरी करके किसी तरह अपना आसरा बसाया है। मगर, वह भी अब तक अपना नहीं हो सका है। सरकारी उपेक्षा का शिकार परिवार हो रहा है।