सिख धर्म के पहले गुरु श्री नानक देव और नौवें गुरु श्री तेगबहादुर के पग से पावन हुआ माईथान गुरुद्वारा एक और इतिहास समेटे है। ये 109 साल पुराने एक इंच के दुर्लभ श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रकाश से जगमग है। पहले विश्व युद्ध के समय इन्हें बनाया गया था। संगत शनिवार को प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में इनका दर्शन कर सकेंगे।
गुरुद्वारा के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी कुलविंदर सिंह ने बताया कि पहले विश्व युद्ध में सिख रेजिमेंट को युद्ध के लिए भेजा जा रहा था। तब सिखों ने कहा कि वो अपने पवित्र ग्रंथ को भी साथ लेकर जाएंगे। श्री गुरु ग्रंथ साहिब का आकार बड़ा होने के कारण साथ ले जाना संभव नहीं था। ऐसे में जर्मन प्रिंटिंग प्रेस ने लघु स्वरूप तैयार करने का निर्णय लिया। ऐसे में एक इंच चौड़ाई, एक इंच लंबाई और पौने इंच की मोटाई के श्री गुुरु ग्रंथ साहिब तैयार किए गए। इसमें 1430 अंग हैं। इनके 13 स्वरूप तैयार करने के बाद डाई नष्ट कर दी गई। ये चांदी के बॉक्स में रखे हैं। इनमें से एक स्वरूप गुरुद्वारा में विशेष रोशनी में विराजमान है।
साल में एक बार कराए जाते हैं दर्शन
श्री सुखमनी सेवा सभा के वीर महेंद्र पाल सिंह ने बताया कि श्री गुरुग्रंथ साहिब के दर्शन साल में एक बार ही कराए जाते हैं। यह अवसर श्री गुुरु ग्रंथ साहिब के प्रकाश पर्व पर आता है। इसी कड़ी में 16 सितंबर को दर्शन के लिए खोला गया है। इस दिन पूरे दिन कीर्तन दरबार सजता है, जिसमें दूरदराज से संगत आकर दर्शन लाभ पाते हैं।
गुुरुद्वारा माईथान आए थे गुरुवर
गुुरुद्वारा प्रधान सरदार कंवलदीप सिंह और बंटी ग्रोवर ने बताया कि 1566 में सिख धर्म के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव के पग पड़े थे। उस वक्त 18 साल की युवती (माता जस्सी) को गुरु नानक देव ने दर्शन दिए थे। उन्होंने सिख रूप धारण कर सिख धर्म का प्रचार-प्रसार किया और गुरुद्वारा की स्थापना हुई। सिख धर्म के नौवें गुरु श्री तेगबहादुर आए और माता जस्सी ने अपने हाथ से बुने कपड़े का थान गुरुजी को भेंट किया था। तब से गुरुद्वारा का नाम माईथान पड़ा।