जब हौसलों में जान और इरादों में चट्टान जैसी मजबूती हो तो सफलता खुद-ब-खुद कदम चूमती है। नीट-2026 के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी सुख-सुविधा की मोहताज नहीं होती। जब कड़ा परिश्रम, दृढ़ संकल्प और कुछ कर गुजरने की इच्छाशक्ति हो तो अभावों से भी सफलता के मोती जन्म लेते हैं। नीट में मिली कामयाबी सिर्फ कुछ छात्रों की जीत नहीं है, बल्कि उन आंसुओं और पसीने की कहानी है जो एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पिता ने दिन-रात बहाए। यह उस एएनएम मां की जीत है जिसने अपनी सारी मेहनत बच्चों के सपनों को बुनने में लगा दी। यह उस पिता के गर्व की कहानी है, जिसके जुड़वां बच्चों ने एक साथ सफलता का परचम लहराकर उनके संघर्ष को सार्थक कर दिया। ये कहानियां हमें सिखाती हैं कि परिस्थितियां चाहें कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि मन में अटूट विश्वास हो तो बंद कमरे में भी कामयाबी का सूरज उग सकता है।
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छोटे मकान में रहकर हासिल किया बड़ा मुकाम
नीट में ऑल इंडिया 2077 रैंक प्राप्त करने वाले अरुण चौहान को पहले ही प्रयास में सफलता मिली। इसी साल बलूनी पब्लिक स्कूल से 12वीं की परीक्षा में 97.4 प्रतिशत अंक हासिल कर स्कूल टॉप किया। एत्मादपुर तहसील के उस्मानपुर निवासी अरुण के पिता किसान और मां एएनएम हैं। एक कमरे के घर में पांच सदस्य रहते हैं। मां निर्मला देवी ने बताया कि बच्चों की पढ़ाई के लिए रुपये उधार मांगने से लेकर अपने गहने तक बेचने की नौबत आ गई लेकिन उन्होंने और बेटे ने हिम्मत नहीं हारी। अरुण बताते हैं कि जब नीट की पुनर्परीक्षा की घोषणा हुई तो थोड़ा डर भी लगा। ऐसे में बड़े भाई-बहन ने उसका हौसला टूटने नहीं दिया। पिता प्रमोद कुमार कहते हैं कि अंत में कोचिंग की फीस भरने के लिए भी रुपये नहीं बचे तो कोचिंग संचालक ने भी बेटे की मेहनत और लगन को देखकर उनसे बची हुई फीस नहीं ली।
दो बार की विफलता के बाद भी नहीं छोड़ा मैदान
एमडी जैन इंटर कॉलेज से 12वीं करने के बाद बॉबी ने कोचिंग संस्थान में प्रवेश ले लिया लेकिन जी-तोड़ मेहनत के बाद भी दो प्रयासों में सफल नहीं हो सके। उनके पिता विनोद कुमार एक कोचिंग संस्थान में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं, जहां बच्चे डॉक्टरी और इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवेश के लिए तैयारी करते हैं। नौकरी के दौरान ही उन्होंने अपने बेटे को डॉक्टर बनाने का ख्वाब देखा। तीसरे प्रयास में बाॅबी लगभग हार मान चुके थे लेकिन संस्थान के शिक्षकों और पिता की हौसलाअफजाई ने उन्हें फिर से हिम्मत दी। इस साल बॉबी ने नीट में 14520 रैंक प्राप्त कर सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के ख्वाब को साकार कर लिया। बाॅबी ने बताया कि वह हर रोज 10 से 12 घंटे पढ़ाई करते थे। पिता विनोद कुमार बताते हैं कि बेटे की सफलता की खुशी में मुंह मीठा कराने के लिए उधार के रुपयों से मिठाई लेकर आए हैं।
खुशियों की डबल डोज...जुड़वां भाई-बहन को मिली कामयाबी
बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक सतेंद्र पाल सिंह के जुड़वां बच्चों उत्कर्ष और उन्नति ने पहले प्रयास में ही नीट में क्रमश: 235 और 5259 रैंक प्राप्त की। मूल रूप से टूंडला निवासी दोनों मेधावियों ने 12वीं की पढ़ाई आगरा से ही की। नीट की तैयारी के लिए भी दोनों रोजाना टूंडला से आगरा आते थे। सुबह 7 बजे घर से निकलकर शाम 5 बजे वापस पहुंचते। मां बेबी सिंह बताती हैं कि रोजाना कोचिंग और स्कूल आने-जाने में करीब तीन घंटे समय लग जाता था। गर्मी-सर्दी बरसात हर मौसम में बच्चे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से नियमित स्कूल और कोचिंग जाते थे। नियमित पढ़ाई के बाद बच्चे नीट की तैयारी के लिए सेल्फ स्टडी करते थे। उत्कर्ष और उन्नति को चिकित्सक बनने की प्रेरणा बड़े भाई चेतन से मिली। चेतन वर्तमान में एसएन मेडिकल कॉलेज के एमबीबीएस तृतीय वर्ष के छात्र हैं। उत्कर्ष और उन्नति के चयन के साथ ही परिवार के तीन बच्चे डॉक्टर बन जाएंगे।